करोड़ों का विधानसभा भवन, लेकिन पहाड़ की राजधानी का सवाल आज भी अधूरा, सत्ता ने बजट पास कराया, विपक्ष ने काले झंडे दिखाए, सदन में गूंजे झुमके के नारे
सवाल सरकार से भी, विपक्ष से भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की इच्छाशक्ति किसके पास है?
गैरसैंण। उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में विधानसभा का दो दिवसीय सत्र डेढ़ दिन में ही समाप्त हो गया। पहाड़ की उम्मीदों का प्रतीक बनकर खड़ा भराड़ीसैंण का विधानसभा भवन एक बार फिर सत्ता और विपक्ष के सियासी टकराव का गवाह बना। सरकार ने 7844.18 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट और 10 विधेयक पारित करा लिए। विपक्ष ने भ्रष्टाचार के आरोपों पर चर्चा की मांग की, काले झंडे लहराए और सदन के वेल में पहुंचकर नारेबाजी की। नतीजा यह कि जनता के सवाल सदन में उठे जरूर, लेकिन उन पर सार्थक बहस कितनी हुई, यह अपने आप में बड़ा सवाल बनकर रह गया।
लोकतंत्र की विडंबना देखिए। जिस सदन में पहाड़ की बदहाली, बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य सेवाओं और भ्रष्टाचार पर जवाब मांगे जाने थे, वहां कार्यवाही बार-बार स्थगित होती रही। सरकार के पास अपना विधायी एजेंडा पूरा करने की जल्दबाजी थी, जबकि विपक्ष अपने आरोपों पर तत्काल चर्चा चाहता था। दोनों के बीच टकराव ऐसा बढ़ा कि सदन की कार्यवाही तीन बार स्थगित करनी पड़ी। अंत में बजट और विधेयक पारित हुए और विधानसभा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई।
अब सवाल यह नहीं कि किसने कितने नारे लगाए और किसने किसकी बात नहीं सुनी। असली सवाल यह है कि उत्तराखंड की जनता को इस सत्र से क्या मिला?
गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित हुए कई वर्ष हो चुके हैं। भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन और अन्य बुनियादी ढांचे पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। यहां सत्र भी आयोजित होते रहे हैं। लेकिन क्या केवल भवन बना देने से पहाड़ की राजधानी का सपना पूरा हो जाता है?
राजधानी का अर्थ सिर्फ विधानसभा भवन, मंत्रियों की बैठक और सरकारी फाइलों का निपटारा नहीं होता। राजधानी वह केंद्र होती है, जहां से विकास की दिशा तय होती है, रोजगार के अवसर बनते हैं और प्रशासन आम नागरिक के करीब पहुंचता है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मूल भावना भी यही थी कि पहाड़ के लोगों को अपने ही क्षेत्र में सम्मानजनक जीवन के अवसर मिलें। गांवों से पलायन रुके, अस्पतालों में इलाज मिले, युवाओं को रोजगार मिले और विकास का लाभ दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचे। गैरसैंण इसी आकांक्षा का प्रतीक बना था।
लेकिन राज्य बनने के बाद से कांग्रेस और भाजपा, दोनों की सरकारें सत्ता में रहीं। गैरसैंण को लेकर घोषणाएं हुईं, भावनात्मक भाषण दिए गए और ग्रीष्मकालीन राजधानी का दर्जा भी मिला। इसके बावजूद स्थायी राजधानी का प्रश्न अनसुलझा है।
यदि गैरसैंण राजधानी बनने के लिए उपयुक्त है, तो उसे स्थायी राजधानी बनाने की स्पष्ट समयसीमा क्यों नहीं तय की जाती? और यदि इसमें व्यावहारिक कठिनाइयां हैं, तो सरकार उन पर सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नीति क्यों नहीं रखती?
इन सवालों का जवाब केवल भावनाओं से नहीं, ठोस कार्ययोजना से मिलना चाहिए।
सत्र की अवधि को लेकर विपक्ष पहले ही सवाल उठा रहा था। उसका आरोप था कि सरकार लंबी चर्चा से बचना चाहती है और सत्र को मुख्य रूप से अनुपूरक बजट पारित कराने तक सीमित रखना चाहती है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नियम 310 के तहत चर्चा की मांग की। विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी भूषण ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद कांग्रेस विधायकों ने सदन में नारेबाजी शुरू कर दी और काले झंडे लहराए।
सरकार के सामने विपक्ष के आरोपों का जवाब देने और अपनी कार्यप्रणाली स्पष्ट करने का अवसर था। दूसरी ओर, विपक्ष के सामने भी यह साबित करने की चुनौती थी कि वह केवल विरोध दर्ज कराने नहीं, बल्कि मुद्दों पर जवाबदेही तय कराने के लिए सदन में आया है।
विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सदन के भीतर विरोध का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि हर गंभीर मुद्दा नारेबाजी में उलझ जाए और बहस की जगह हंगामा ले ले, तो नुकसान अंततः जनता का ही होता है।
सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इतने कम समय के सत्र में विधायी कार्यों और जनहित के मुद्दों के बीच संतुलन कैसे बनाया गया। विपक्ष को भी बताना होगा कि जिन सवालों पर वह सरकार को घेरना चाहता है, उन्हें सदन में तार्किक और प्रभावी ढंग से उठाने की रणनीति क्या थी।
सत्र के दौरान कैबिनेट मंत्री रेखा आर्या से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के आरोप भी टकराव के केंद्र में रहे। उनके पति गिरधारी लाल साहू की ओर से करीब 210 करोड़ रुपये की संपत्ति को लेकर लगाए गए आरोपों के आधार पर कांग्रेस ने सरकार से जवाब मांगा। रेखा आर्या इन आरोपों को निराधार बता चुकी हैं।
सदन में विपक्ष ने मंत्री को निशाने पर लेते हुए कथित 210 करोड़ रुपये के आभूषणों को लेकर भी नारे लगाए। नारेबाजी में ‘झुमका’ शब्द के इस्तेमाल पर विधानसभा अध्यक्ष ने आपत्ति जताई।
यहां एक बुनियादी फर्क समझना जरूरी है। किसी मंत्री पर आरोप लगना और आरोप साबित होना दो अलग बातें हैं। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उनका निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए। यदि विपक्ष के पास दस्तावेज हैं, तो उन्हें सामने लाकर जांच और चर्चा की मांग करनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं, तो संबंधित पक्ष को तथ्यों के साथ अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
लेकिन जब गंभीर आरोपों की बहस व्यक्तिगत तंज और नारेबाजी में बदल जाती है, तो मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है। जनता को न तो केवल आरोप सुनने हैं और न ही केवल उनका खंडन। उसे तथ्य, जांच और जवाब चाहिए।
सदन की गरिमा बनाए रखना केवल विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं है। सत्ता पक्ष, विपक्ष और पीठ तीनों की अपनी भूमिका है। राजनीतिक विरोध के बीच भी सदन को वह स्थान बने रहना चाहिए, जहां सवालों का जवाब दिया जाए, न कि सवाल पूछने वाले और जवाब देने वाले एक-दूसरे को नीचा दिखाने में जुट जाएं।
सत्र के दौरान 7844.18 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट पारित किया गया। दस विधेयकों को भी मंजूरी मिली। ये बड़े वित्तीय और विधायी निर्णय हैं, जिनका महत्व कम करके नहीं आंका जा सकता। लेकिन बजट पारित होना और बजट के जरिए जनता की समस्याओं का समाधान सुनिश्चित होना दो अलग बातें हैं।
सवाल यह है कि इस अतिरिक्त बजट से पहाड़ के अस्पतालों की स्थिति कितनी सुधरेगी? दूरस्थ गांवों तक सड़क और परिवहन सुविधाएं कितनी पहुंचेंगी? युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे? पलायन रोकने के लिए कौन-सी समयबद्ध योजनाएं लागू होंगी? और गैरसैंण को प्रशासनिक गतिविधियों का नियमित केंद्र बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे? इन सवालों के जवाब बजट की राशि से अपने आप नहीं मिलते। इनके लिए विभागवार खर्च, योजनाओं की समयसीमा, जिम्मेदार अधिकारियों और परिणामों की सार्वजनिक निगरानी जरूरी है।
विकास का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितना बजट पारित हुआ। यह भी देखा जाना चाहिए कि पैसा कहां खर्च हुआ, किसे लाभ मिला और तय लक्ष्य कितने पूरे हुए।
सत्र के दौरान नाराज विधायकों को मनाने के लिए संसदीय कार्यमंत्री सुबोध उनियाल के पहुंचने की चर्चा भी रही। सदन के भीतर सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव तथा बाहर नाराजगी दूर करने की कोशिशें उत्तराखंड की मौजूदा राजनीतिक कार्यशैली की तस्वीर पेश करती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक प्रबंधन का उद्देश्य केवल सत्र चलाना और विधायी कामकाज पूरा कराना है, या जनहित के मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश भी उसका हिस्सा है? विधानसभा में मतभेद स्वाभाविक हैं। सरकार और विपक्ष की भूमिकाएं अलग हैं। मगर दोनों की जवाबदेही जनता के प्रति है। यदि सदन में चर्चा के लिए पर्याप्त समय नहीं होगा, तो गंभीर मुद्दे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच दबते रहेंगे।
उत्तराखंड की राजधानी पहाड़ में होनी चाहिए या नहीं, इस पर बहस को केवल भावनात्मक नारे तक सीमित नहीं रखा जा सकता। स्थायी राजधानी के सवाल के साथ प्रशासनिक पहुंच, भौगोलिक परिस्थितियां, परिवहन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और वित्तीय संसाधनों जैसे पहलुओं पर गंभीर विचार जरूरी है। लेकिन इन चुनौतियों का उल्लेख करके सवाल को अनिश्चितकाल तक टाल देना भी समाधान नहीं है। यदि गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का निर्णय लिया जाता है, तो उसके लिए चरणबद्ध योजना, संसाधनों का आकलन और स्पष्ट समयसीमा सामने आनी चाहिए। यदि सरकार किसी दूसरे प्रशासनिक मॉडल को उचित मानती है, तो उसे भी सार्वजनिक चर्चा और ठोस तथ्यों के साथ प्रस्तुत करना चाहिए।
हिमालयी राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए किसी दूसरे राज्य का मॉडल ज्यों का त्यों अपनाने के बजाय उत्तराखंड की जरूरतों के अनुरूप व्यवस्था बनानी होगी। इस बहस में पहाड़ और मैदान को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करने के बजाय क्षेत्रीय संतुलन को केंद्र में रखना चाहिए।
गैरसैंण का सवाल भाजपा से भी है और कांग्रेस से भी। दोनों दलों को बताना होगा कि सत्ता में रहते हुए उन्होंने स्थायी राजधानी की दिशा में क्या ठोस कदम उठाए। केवल घोषणाओं और विरोध प्रदर्शनों से यह प्रश्न हल नहीं होगा।
सरकार को सत्र की अवधि, विधायी कामकाज और जनहित के मुद्दों पर चर्चा के अवसरों को लेकर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। विपक्ष को यह बताना चाहिए कि वह आरोपों को तथ्यात्मक बहस, दस्तावेजों और जवाबदेही की मांग में कैसे बदलेगा।
विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी है कि सदन में नियमों का पालन हो, पक्ष-विपक्ष को निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत अपनी बात रखने का अवसर मिले और कार्यवाही की गरिमा बनी रहे।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन जनप्रतिनिधियों की है, जो जनता के नाम पर सदन तक पहुंचे हैं। जनता ने उन्हें नारे लगाने के लिए ही नहीं, बल्कि कानून बनाने, बजट पर विचार करने और सरकार से सवाल पूछने के लिए भी चुना है।
गैरसैंण में सत्र समाप्त हो गया। बजट पारित हो गया। विधेयकों को मंजूरी मिल गई। राजनीतिक बयानबाजी भी अपने रास्ते चलती रहेगी। लेकिन पहाड़ की राजधानी का सवाल अभी बाकी है।
गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने का निर्णय हो या किसी दूसरे प्रशासनिक मॉडल पर सहमति बने उत्तराखंड को अब अस्पष्टता नहीं, स्पष्ट नीति चाहिए। क्योंकि राज्य की राजधानी केवल नक्शे पर दर्ज एक स्थान नहीं होती। वह बताती है कि सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं और विकास का लाभ किन लोगों तक पहुंचाना है।
गैरसैंण के नाम पर राजनीति करने का समय बहुत हो चुका। अब जरूरत है कि सत्ता जवाब दे, विपक्ष अपनी भूमिका निभाए और पहाड़ के भविष्य पर फैसला नारों से नहीं, नीति और इच्छाशक्ति से हो।
