भराड़ीसैंण/गैरसैंण। उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी राज्य आंदोलनकारियों की जनभावना की राजधानी गैरसैंण आज तक अपेक्षित अवस्थापना सुविधाओं के लिए तरस रही है। यहां भव्य विधानसभा भवन तो बन चुका है, लेकिन इसके आसपास बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का गंभीर अभाव बना हुआ है।

राज्य आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों ने तय किया था कि अलग राज्य बनने पर गढ़वाल और कुमाऊं के मध्य स्थित गैरसैंण को राजधानी बनाया जाएगा। वर्ष 1992 में चंद्रनगर, गैरसैंण में राजधानी के रूप में इसका शिलान्यास भी किया गया था। उस समय गठित कौशिक समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि राज्य की लगभग 65 प्रतिशत जनता गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के पक्ष में है।

हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किए जाने के बावजूद यहां अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है। स्थानीय निवासी अंजना बिष्ट बताती हैं कि राज्य गठन के समय गैरसैंण को विकसित कर प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाने की बात कही गई थी, लेकिन आज भी जमीनी हकीकत इससे अलग है। कर्णप्रयाग से गैरसैंण तक सड़क अभी भी सिंगल लेन है और स्वास्थ्य, शिक्षा समेत अन्य बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव बना हुआ है।

स्थानीय पूजा का कहना है कि जिस तरह उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए लंबा संघर्ष हुआ था, उसी तरह अब गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने और इसके समुचित विकास के लिए भी जनता को फिर से आंदोलन करना पड़ सकता है। उनका कहना है कि यदि गैरसैंण को वास्तव में ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में विकसित करना है तो सरकार को यहां सड़क, स्वास्थ्य, प्रशासनिक ढांचे और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा।

स्थानीय महिलाओं का कहना है कि गैरसैंण आने वाले लोगों के ठहरने के लिए भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। देहरादून या अन्य स्थानों से आने वाले लोगों को रात बिताने के लिए 60 से 65 किलोमीटर दूर कर्णप्रयाग या अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है। विधानसभा सत्र के दौरान भी यह स्थिति साफ नजर आती है। सड़क के साथ-साथ यहां मोबाइल नेटवर्क कनेक्टिविटी भी कमजोर है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी तो घोषित कर दिया गया, लेकिन यह व्यवस्था अभी भी कागजों तक ही सीमित है। यहां न तो उद्योग पहुंचे हैं और न ही बड़े प्रशासनिक कार्यालय स्थापित हुए हैं। महिलाओं के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं का लाभ भी पूरी तरह नहीं मिल पा रहा है।

स्थानीय लोगों का यह भी आरोप है कि कुछ विधायक और अधिकारी गैरसैंण में रुकना ही नहीं चाहते। कई जनप्रतिनिधि बजट सत्र खत्म होने से पहले ही देहरादून लौट जाते हैं। ऐसे में लोगों का कहना है कि जो नेता गैरसैंण को राजधानी बनाने की बात करते हैं, उनके लिए यह स्थान आज भी ‘गैर’ ही बना हुआ है।