Kolkata, India - May 15, 2016: Construction workers and Engineers working for the construction of a high rise building in Kolkata with the famous Howrah Bridge in the background

देहरादून। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत ग्रामीण परिवारों को वर्ष में 100 दिन का रोजगार देने की गारंटी है, लेकिन उत्तराखंड में यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अप्रैल 2019 से मार्च 2024 के बीच राज्य में औसतन 6.54 लाख परिवारों को साल में केवल 21 दिन का ही रोजगार मिल पाया।

कैग रिपोर्ट के अनुसार मनरेगा ग्रामीण परिवारों को मजदूरी आधारित रोजगार देकर उनकी आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने की एक प्रमुख योजना है। उत्तराखंड में 66 प्रतिशत से अधिक आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है, इसलिए यह योजना राज्य के ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, खासकर पर्वतीय जिलों के लिए जो भौगोलिक और आर्थिक विषमताओं से प्रभावित हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अप्रैल 2019 से मार्च 2024 के दौरान राज्य को उपलब्ध 3647.21 करोड़ रुपये की धनराशि में से 3638.95 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस अवधि में 27.04 लाख परिवारों को मजदूरी रोजगार उपलब्ध कराया गया और 2340.06 करोड़ रुपये के मजदूरी भुगतान के साथ कुल 11.56 करोड़ मानव दिवस सृजित किए गए।

हालांकि, रिपोर्ट में योजना के वित्तीय प्रबंधन और क्रियान्वयन में कई कमियां भी सामने आई हैं। रोजगार गारंटी निधि को समय पर जारी न करने के कारण 2.03 करोड़ रुपये की ब्याज देनदारी और सामग्री मदों में 122.40 करोड़ रुपये की लंबित देयता पाई गई।

इसके अलावा पात्र परिवारों की पहचान के लिए घर-घर सर्वे भी नहीं कराया गया। रिपोर्ट के मुताबिक चयनित ग्राम पंचायतों में 2019 से 2024 के बीच किसी भी पंचायत ने इस संबंध में सर्वे नहीं किया।

जांच में यह भी सामने आया कि मनरेगा के तहत जारी 39 प्रतिशत जॉब कार्ड बिना फोटो के थे, जबकि जॉब कार्ड श्रमिकों की पात्रता का महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।

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