देहरादून। उत्तराखंड में जमीन सिर्फ जमीन नहीं है यह पहाड़ की पहचान, पानी का भविष्य और आने वाली पीढ़ियों की विरासत है। लेकिन जब कृषि भूमि खरीदने के बाद वही जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर बेचने के आरोप लगें, तो सवाल सिर्फ खरीदार पर नहीं उठता, सवाल उस पूरी व्यवस्था पर उठता है जिसने यह सब होने दिया।
देहरादून में अधिवक्ता सेवा मंच उत्तराखंड और पहाड़ स्वाभिमान सेना की पत्रकार वार्ता में पौड़ी गढ़वाल के एराड़ी गांव की करीब 144 नाली भूमि की खरीद को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। आरोप है कि दून हैचरीज प्राइवेट लिमिटेड ने भूमि कृषि प्रयोजन के नाम पर खरीदी, लेकिन बाद में उसे छोटे भूखंडों में बांटकर बाहरी लोगों को बेचने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। अगर आरोप सही हैं तो यह सिर्फ जमीन की खरीद-बिक्री का मामला नहीं है। यह उस भू-कानून की परीक्षा है जिसके जरिए पहाड़ की जमीन को बचाने का दावा किया जाता रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस जमीन को खरीदते समय कृषि उपयोग बताया गया, उसका इस्तेमाल बाद में क्या हुआ?
पत्रकार वार्ता में मांग की गई कि एराड़ी की पूरी जमीन के राजस्व रिकॉर्ड, रजिस्ट्री, भूमि उपयोग, अनुमति, स्वीकृतियां और बाद में हुए भूखंडों के हस्तांतरण की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
क्योंकि अगर कृषि भूमि का रास्ता रजिस्ट्री से निकलकर प्लॉटिंग तक पहुंच गया है, तो बीच में कानून की कौन-सी दीवार गायब हुई यह पता लगाना सरकार की जिम्मेदारी है।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। संबंधित कंपनी के पुराने होने के दावे पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। वक्ताओं के अनुसार कंपनी वर्ष 1995 में गठित होने का दावा करती है और वर्ष 2003 से पहले की भूमि खरीद को अपने अधिकार का आधार बताती है। देहरादून में वर्ष 1997 में संपत्ति खरीदने का दावा भी जांच के घेरे में बताया गया। दूसरी तरफ वर्तमान निदेशकों के निदेशक बनने की तिथियां वर्ष 2016 के बाद की बताई जा रही हैं।
अब सवाल सीधा है कंपनी पुरानी है तो उसकी संपत्ति और वर्तमान प्रबंधन के बीच कानूनी और स्वामित्व की पूरी कड़ी क्या है?
इसका जवाब दस्तावेज देंगे, बयान नहीं। कंपनी का गठन कैसे हुआ, पुराने निदेशक कौन थे, शेयरहोल्डिंग किसके पास रही, संपत्तियां किस तरह खरीदी गईं और आज कंपनी उत्तराखंड में वास्तव में क्या कर रही है इन सबकी जांच की मांग की गई है।
उत्तराखंड में भू-कानून को लेकर लंबे समय से चिंता रही है। पत्रकार वार्ता में आरोप लगाया गया कि पुरानी कंपनियों का इस्तेमाल कर भूमि खरीद से जुड़ी शर्तों को दरकिनार करने की आशंका बढ़ रही है। यदि ऐसा हो रहा है तो सवाल किसी एक कंपनी का नहीं रहेगा। सवाल यह होगा कि क्या कानून की धाराओं के भीतर ही ऐसी खिड़कियां छोड़ दी गई हैं, जिनसे बड़े कारोबारी पहाड़ की जमीन तक पहुंच सकते हैं? वक्ताओं ने वर्ष 2003 से पहले अस्तित्व में आई कंपनियों के नाम पर उत्तराखंड में खरीदी गई भूमि का जनपदवार ऑडिट कराने की मांग की है।
यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं कि कंपनी कितनी पुरानी है। यह देखना जरूरी है कि कंपनी बनी किस काम के लिए थी और जमीन खरीदकर कर क्या रही है।
पत्रकार वार्ता में वर्ष 2017-18 के दौरान भू-कानून में हुए बदलावों और विशेष रूप से धारा 154 से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा की मांग उठाई गई।
आरोप है कि नगर पालिका, नगर पंचायत और कैंट क्षेत्रों जैसे प्रावधानों ने बाहरी व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए जमीन खरीद की संभावनाएं बढ़ाई हैं।
सरकार से मांग है कि कानून को सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि पहाड़ की वास्तविक भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के हिसाब से देखा जाए। क्योंकि मैदान का जमीन मॉडल पहाड़ पर जस का तस लागू कर दिया गया तो नुकसान सिर्फ नक्शे पर नहीं होगा नदियों, जंगलों, गांवों और जलस्रोतों तक पहुंचेगा।
लैंसडौन और यमकेश्वर में भूमि खरीद, प्लॉटिंग, रिसॉर्ट, आश्रम और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों की भी विशेष जांच की मांग की गई है।
यहां भी मूल सवाल वही है कृषि भूमि किसलिए खरीदी गई और बाद में उसका इस्तेमाल किसलिए हुआ? अगर जमीन कृषि के नाम पर खरीदी गई और उस पर व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो गईं, तो भूमि उपयोग परिवर्तन, नक्शा, निर्माण अनुमति, पर्यटन विभाग की मंजूरी, पर्यावरणीय स्वीकृति और दूसरी वैधानिक अनुमतियों की जांच क्यों न हो?
कैटल गांव में कथित पेड़ कटान और आश्रम निर्माण का मुद्दा भी उठाया गया। अगर किसी निर्माण स्थल तक पहुंचने वाला रास्ता आरक्षित वन क्षेत्र से होकर जाता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है रास्ता किस जमीन पर बना, अनुमति किसने दी और किस कानून के तहत दी? इसी तरह खरीदी गई भूमि पर मौजूद बहुमूल्य पेड़ों का उल्लेख भूमि दस्तावेजों में क्यों नहीं है इस आरोप की भी जांच की मांग की गई है। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और आधिकारिक अभिलेखों के आधार पर ही निकाला जा सकता है। सबसे गंभीर चिंता भूजल को लेकर सामने आई। आश्रम, होटल, वेलनेस सेंटर और पंचकर्म केंद्रों द्वारा कथित बोरिंग और भूजल दोहन की जांच की मांग की गई है। पहाड़ में पानी सिर्फ पाइप से आने वाली चीज नहीं है। एक गांव का प्राकृतिक स्रोत सूखता है तो उसके साथ पूरा सामाजिक जीवन प्रभावित होता है। इसलिए सवाल होना चाहिए किसने बोरिंग की अनुमति दी? कितना पानी निकाला जा रहा है? पानी कहां से आ रहा है? और स्थानीय जलस्रोतों पर इसका क्या असर पड़ रहा है? इन सवालों का वैज्ञानिक और विभागीय ऑडिट होना चाहिए।
पत्रकार वार्ता में राजस्व विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए। यह महत्वपूर्ण बात है। अगर किसी जमीन की खरीद, उपयोग परिवर्तन या निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो सिर्फ खरीदार को कटघरे में खड़ा करके कहानी खत्म नहीं हो सकती। फाइल किसने देखी? अनुमति किसने दी? रिकॉर्ड किसने प्रमाणित किया? जमीन का उपयोग किसने जांचा? हर स्तर की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। क्योंकि व्यवस्था में गलती सिर्फ वह व्यक्ति नहीं करता जो नियम तोड़ता है। कभी-कभी वह भी जिम्मेदार होता है जो नियम टूटते हुए देखकर फाइल पर चुप्पी साध लेता है। अधिवक्ता सेवा मंच और पहाड़ स्वाभिमान सेना ने एराड़ी की 144 नाली जमीन की उच्चस्तरीय जांच से लेकर वर्ष 2003 से पहले की कंपनियों की जमीन का जनपदवार ऑडिट, कृषि भूमि के वास्तविक उपयोग का सत्यापन, लैंसडौन-यमकेश्वर में विशेष जांच, वन क्षेत्र के रास्तों की जांच और बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के भूजल दोहन के ऑडिट की मांग की है। मांगों की सूची लंबी है, लेकिन सरकार के लिए सवाल छोटा है, क्या उत्तराखंड में भू-कानून जनता और पहाड़ की रक्षा के लिए है, या उसकी धाराओं के बीच से जमीन का कारोबार निकालने के लिए? एराड़ी की 144 नाली जमीन का मामला आरोपों से आगे जाकर दस्तावेजों की जांच तक पहुंचना चाहिए। कंपनी गलत है तो कार्रवाई हो। आरोप गलत हैं तो वह भी सार्वजनिक हो। अधिकारी दोषी हैं तो उनकी जवाबदेही तय हो। क्योंकि पहाड़ में जमीन एक बार हाथ से निकल जाए तो सरकारी फाइल में उसे वापस लाना आसान नहीं होता।
उत्तराखंड की जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए अब बयान नहीं, रिकॉर्ड खोलने होंगे।
और सबसे बड़ा सवाल यही है पहाड़ की जमीन बिक रही है, तो खरीदार कौन है, बेचने वाला कौन है और कानून की चौखट पर खड़ा होकर दरवाजा खोलने वाला कौन है?