देहरादून। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हुए रामपुर तिराहा कांड के शहीदों की स्मृति में प्रस्तावित प्रतिमाएं अब तक स्थापित नहीं हो सकी हैं। घटना के करीब 32 साल बाद भी प्रतिमाएं लगाने की प्रक्रिया पूरी नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राज्य आंदोलनकारी संगठनों और शहीदों के परिजनों की ओर से लंबे समय से शहीदों की स्मृति को स्थायी रूप देने की मांग की जाती रही है।

रामपुर तिराहा कांड 2 अक्तूबर 1994 को हुआ था। अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने रोक लिया था। इस दौरान हुई झड़प और गोलीबारी में उत्तराखंड के सात आंदोलनकारियों की मौत हुई थी। घटना में कई आंदोलनकारी घायल भी हुए थे। मामले में महिला आंदोलनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप भी सामने आए थे। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई और विभिन्न आरोपियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए।

उत्तराखंड गठन के बाद से ही राज्य आंदोलन के शहीदों की स्मृति को संरक्षित करने और उनके सम्मान में स्मारक व प्रतिमाएं स्थापित करने की मांग उठती रही है। राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि शहीदों ने अलग राज्य की मांग के लिए अपना बलिदान दिया, इसलिए उनकी स्मृति में प्रस्तावित कार्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाना चाहिए।

इस बीच राज्य आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण का मुद्दा भी लगातार चर्चा में है। सरकार ने लंबित आवेदनों के निस्तारण के लिए समयसीमा 24 सितंबर 2026 तक बढ़ाई थी। जिलों में चिन्हीकरण समितियों की बैठकें आयोजित कर मामलों की जांच की जा रही है।

देहरादून में हाल में हुई राज्य आंदोलनकारी चिन्हीकरण समिति की बैठक में जिलाधिकारी ने लंबित मामलों को निर्धारित नियमों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर निस्तारित करने के निर्देश दिए।

रामपुर तिराहा कांड की बरसी से पहले शहीदों की प्रतिमाएं स्थापित करने में हो रही देरी का मुद्दा एक बार फिर सामने आया है। राज्य आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि शहीदों के सम्मान से जुड़े कार्यों में अनावश्यक विलंब नहीं होना चाहिए और प्रस्तावित प्रतिमाओं की स्थापना की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।