देहरादून में फर्जी प्रमाणपत्रों के आरोपों ने खड़े किए सिस्टम पर गंभीर सवाल। स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे से एमबीबीएस दाखिले तक पहुंचा मामला। एसआईटी ने एक और आरोपी को भोपाल से पकड़ा, 5.58 लाख रुपये नकद बरामद। सवाल फर्जी दस्तावेज बनाने वालों के साथ सरकारी सत्यापन तंत्र की जवाबदेही कब तय होगी?
देहरादून। सरकारी दफ्तर में एक प्रमाणपत्र बनवाना आम आदमी के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं होता। कभी दस्तावेज कम पड़ जाते हैं, कभी सत्यापन की बारी आती है और कभी फाइल एक मेज से दूसरी मेज तक घूमती रहती है। आवेदक चक्कर लगाता है और व्यवस्था अपने समय से चलती है। लेकिन देहरादून से सामने आया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों में कथित फर्जीवाड़े का मामला इस व्यवस्था के सामने इससे भी बड़ा सवाल खड़ा करता है अगर सरकारी प्रमाणपत्र हासिल करना इतना कठिन है, तो कथित फर्जी प्रमाणपत्र आखिर सरकारी व्यवस्था की चौखट पार करके मेडिकल कॉलेज तक कैसे पहुंच गए?
मामला अब सिर्फ चार प्रमाणपत्रों के निरस्तीकरण या कुछ लोगों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं दिखता। आरोपों की जांच की कड़ियां फर्जी दस्तावेजों से लेकर प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया और फिर उन्हीं प्रमाणपत्रों के आधार पर एमबीबीएस दाखिले तक पहुंच चुकी हैं। ऐसे में असली सवाल यह है कि इस पूरे तंत्र में केवल वे लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए, या उस सरकारी प्रक्रिया की भी जवाबदेही तय होगी जिसके सत्यापन के बाद ये दस्तावेज प्रमाणपत्र में बदल गए?
नीट-यूजी 2025 में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से एमबीबीएस में दाखिला दिलाने के मामले में देहरादून पुलिस की एसआईटी ने एक और आरोपी धीरज कुमार श्रीवास्तव को भोपाल से गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार उसके वाहन से 5,58,100 रुपये नकद बरामद हुए हैं। जांच में पुलिस इस रकम को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे से दाखिला दिलाने के एवज में कथित कमीशन से जोड़ रही है। इस मामले में पुलिस पहले रूपेश पंडित और अरविंद कुमार को गिरफ्तार कर चुकी है। पुलिस के मुताबिक रूपेश की निशानदेही पर मेरठ स्थित उसके घर से आठ लाख रुपये बरामद किए गए थे। इस तरह पुलिस अब तक कुल 13,58,100 रुपये नकद बरामद करने की बात कह रही है।
पुलिस के अनुसार तीन अभ्यर्थियों के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र बनवाए गए और इन्हीं के आधार पर अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस में दाखिला कराया गया। जांच में प्रत्येक दाखिले के लिए 45 लाख रुपये में सौदा तय होने और 20-20 लाख रुपये एडवांस लिए जाने की बात भी सामने आने का दावा किया गया है।
यहीं से कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शुरू होता है।
फर्जी दस्तावेज किसी व्यक्ति ने बनाए होंगे यह जांच का विषय है। किसी ने उन दस्तावेजों के आधार पर आवेदन किया होगा यह भी जांच का विषय है। लेकिन जब वही दस्तावेज सरकारी प्रमाणपत्र में बदल गए, तब सत्यापन की जिम्मेदारी किस स्तर पर थी? मामले की जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन एसडीएम हरिगिरि और एसडीएम अपूर्वा सिंह के हस्ताक्षरों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि केवल किसी अधिकारी के हस्ताक्षर प्रमाणपत्र जारी करने में उनकी व्यक्तिगत संलिप्तता साबित नहीं करते। प्रशासनिक व्यवस्था में सत्यापन कई स्तरों पर होता है। इसलिए जांच का असली प्रश्न यह होना चाहिए कि किसने क्या सत्यापित किया, किस रिकॉर्ड के आधार पर किया और किस स्तर पर चूक हुई?
क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र कोई सामान्य कागज नहीं है। यह सीमित पात्रता वाली श्रेणी है। ऐसे में पात्रता का सत्यापन महज औपचारिकता नहीं हो सकता।
सरकारी मुहर के बाद कागज की ताकत बदल जाती है
एक साधारण कागज पर लिखा नाम शायद किसी के जीवन को नहीं बदलता। लेकिन उसी कागज पर सरकारी मुहर लग जाए तो वह अधिकार का दस्तावेज बन जाता है। और अगर उसी दस्तावेज के आधार पर किसी को मेडिकल कॉलेज में सीट मिल जाए, तो मामला केवल कागज की गलती नहीं रह जाता यह उन अभ्यर्थियों के अधिकार का सवाल बन जाता है जो नियमों के मुताबिक पात्र होकर भी प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।
यही वजह है कि जांच का दायरा केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि फर्जी प्रमाणपत्र किसने बनवाया। यह भी सामने आना जरूरी है कि आवेदन किसने किया, दस्तावेज किसने तैयार किए, सत्यापन किसने किया, प्रमाणपत्र किस प्रक्रिया से जारी हुआ, कॉलेज ने उसे किस आधार पर स्वीकार किया और आर्थिक लेन-देन की पूरी कड़ी कहां तक जाती है।
विवाद सामने आने के बाद चार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र निरस्त किए जाने और एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई है। बाकी मामलों की जांच जारी बताई जा रही है।
यानी मामला अभी खत्म नहीं हुआ है।
इसके उलट, अब जांच को और व्यापक सवालों तक जाना होगा। अगर एक प्रमाणपत्र फर्जी निकला तो क्या उसके आधार पर हुए दाखिले की भी स्वतंत्र जांच हुई? अगर एक प्रक्रिया में गड़बड़ी मिली तो क्या उसी अवधि में जारी किए गए दूसरे प्रमाणपत्रों का रिकॉर्ड खंगाला गया? क्या संबंधित मूल अभिलेखों का मिलान हुआ? क्या तहसील स्तर से लेकर मेडिकल दाखिले की प्रक्रिया तक दस्तावेजों की श्रृंखला सुरक्षित है?
देहरादून में मामला केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों तक सीमित नहीं है। एससी और डोमिसाइल प्रमाणपत्रों में कथित गड़बड़ियों को लेकर भी शिकायतें और सवाल सामने आए हैं। एक मामले में फर्जी एससी प्रमाणपत्र के आधार पर एमबीबीएस दाखिले का आरोप सामने आया, प्रमाणपत्र निरस्त किया गया और अब सामान्य कोटे से दाखिले के प्रयास की चर्चा है।
दूसरी ओर, बड़ी संख्या में कथित डोमिसाइल प्रमाणपत्रों से जुड़ी शिकायतों की जांच का भी इंतजार है।
यहां सरकार और प्रशासन के सामने सवाल सीधा है क्या अलग-अलग मामलों को अलग-अलग घटनाएं मानकर निपटाया जाएगा या प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी व्यवस्था का ऑडिट होगा? सीएससी बंद करने से सिस्टम की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती
यदि किसी स्तर पर कॉमन सर्विस सेंटर या किसी अन्य माध्यम का इस्तेमाल नियम विरुद्ध हुआ है तो कार्रवाई जरूरी है। लेकिन केवल किसी सीएससी को बंद कर देना पूरे मामले का उत्तर नहीं हो सकता। क्योंकि सीएससी प्रमाणपत्र का अंतिम वैधानिक प्राधिकारी नहीं है। उसके बाद सरकारी जांच, सत्यापन और अनुमोदन की प्रक्रिया होती है।
इसलिए सवाल यह भी है कि फर्जी दस्तावेजों की एंट्री कहां हुई और सरकारी सत्यापन की दीवार किस जगह कमजोर पड़ी? यहाँ सीधा सवाल य़ह हैं कि कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के आवेदन से लेकर जारी होने तक पूरी फाइल की जिम्मेदारी किस-किस अधिकारी और कर्मचारी की थी? जिन प्रमाणपत्रों के आधार पर एमबीबीएस में दाखिले हुए, उनके मूल रिकॉर्ड और सत्यापन प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच कब पूरी होगी? क्या उसी अवधि में जारी सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्रों का पुनः सत्यापन कराया जाएगा? एससी और डोमिसाइल प्रमाणपत्रों को लेकर सामने आई शिकायतों की समयबद्ध जांच कब पूरी होगी? अगर जांच में सरकारी स्तर पर लापरवाही, मिलीभगत या नियमों की अनदेखी सामने आती है, तो क्या केवल प्रमाणपत्र निरस्त होंगे या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की भी जवाबदेही तय होगी? और सबसे बड़ा सवाल कि सरकारी मुहर किसकी जिम्मेदारी है? इस पूरे प्रकरण में पुलिस की जांच अपना काम कर रही है। आरोपी गिरफ्तार हो रहे हैं, नकदी बरामद होने की बात सामने आ रही है और एसआईटी दस्तावेज खंगाल रही है। लेकिन पुलिस कार्रवाई कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। दूसरा हिस्सा प्रशासन का है। फर्जी कागज बनाने वाला दोषी है तो उसे कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए। फर्जी प्रमाणपत्र का लाभ लेने वाला दोषी है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि जांच में यह सामने आता है कि सरकारी सत्यापन प्रक्रिया में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा मिलीभगत थी, तो उस हिस्से की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी होगी। क्योंकि अंततः सवाल एक मुहर का है।
वह मुहर जिसने एक कागज को सरकारी प्रमाणपत्र बनाया। और वही प्रमाणपत्र किसी को मेडिकल कॉलेज की सीट तक ले गया। अब देखना यह है कि जांच सिर्फ उन लोगों तक पहुंचती है जिन्होंने फर्जी कागज तैयार किए, या उस पूरी व्यवस्था तक भी पहुंचेगी जिसने उन कागजों को सरकारी प्रमाणपत्र बनने का रास्ता दिया।
