इसके साथ ही 3.87 हेक्टेयर खेती योग्य भूमि और 15.57 हेक्टेयर जंगल का क्षेत्र भी जोखिम में पड़ सकता है। यह चेतावनी भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), डीआरडीओ (DRDO) और ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के एक साझा अध्ययन में दी गई है।
जांचे गए स्थलों में साइट-2 (अनाम ग्लेशियर) को सबसे संवेदनशील माना गया है। इसकी ऊपरी ढलान 34.57 डिग्री तथा निचली ढलान 30.64 डिग्री दर्ज की गई है। इसमें लगभग 53.2 से 58.9 लाख घन मीटर बर्फ होने का अनुमान है। वैज्ञानिक सिमुलेशन के अनुसार, बर्फ धंसने पर हिमस्खलन की रफ्तार 78.5 मीटर प्रति सेकेंड और इसका बहाव 73.5 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच सकता है।
Badrinath : तीन स्थितियों में हुआ आकलन
वैज्ञानिकों ने ‘रैपिड मास मूवमेंट सिमुलेशन’ (RAMMS) मॉडल के जरिए कम, मध्यम और तीव्र—तीन अलग-अलग स्थितियों में खतरे को मापा। निष्कर्ष निकला कि हिमस्खलन कितनी दूर तक जाएगा, यह केवल बर्फ की मात्रा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि पहाड़ी रास्तों की ढलान और जमीन की बनावट भी इसकी गति और प्रभाव में बड़ी भूमिका निभाती है।
Badrinath : सुरक्षा व निगरानी के सुझाव
शोधकर्ताओं की सलाह है कि इस संवेदनशील इलाके में खतरा-मानचित्र (Hazard Mapping) तैयार किया जाए, सुरक्षित क्षेत्रों की पहचान हो, नए निर्माणों पर सख्त रोक लगे और अर्ली वार्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली) स्थापित की जाए।
चूंकि बर्फ की मोटाई और मात्रा का अनुमान सैटेलाइट डेटा व गणितीय मॉडलों पर आधारित है, इसलिए आंकड़ों में थोड़ा बदलाव संभव है। हालांकि, अध्ययन का स्पष्ट संदेश है कि बदरीनाथ में किसी हादसे का इंतजार करने के बजाय समय रहते वैज्ञानिक निगरानी और नियोजित निर्माण पर काम शुरू कर देना चाहिए।
