पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव होता नजर आ रहा है। शुरुआती रुझानों के अनुसार ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सत्ता से बाहर होती दिख रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहली बार राज्य में सरकार बनाने की ओर अग्रसर है। यह चुनाव लंबे समय से जारी क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय दलों की लड़ाई का निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
राज्य में 2011 से लगातार सत्ता में रही ममता बनर्जी की सरकार को इस बार 15 साल की एंटी-इंकंबेंसी का सामना करना पड़ा। भाजपा ने अपने अभियान में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और कथित राजनीतिक हिंसा को प्रमुख मुद्दा बनाया। संदेशखाली और कोलकाता की चर्चित घटनाओं ने महिला सुरक्षा को चुनावी विमर्श के केंद्र में ला दिया, जिससे शहरी और महिला मतदाताओं पर असर पड़ा।
भ्रष्टाचार के आरोप भी टीएमसी के खिलाफ माहौल बनाने में अहम रहे। भर्ती घोटाले और “कट मनी” जैसे मुद्दों ने खासकर युवाओं में नाराजगी बढ़ाई। राज्य के लगभग 1.5 करोड़ युवा मतदाताओं ने इस बार निर्णायक भूमिका निभाई। शिक्षक भर्ती विवाद और नौकरियों में अनियमितताओं ने इस वर्ग को सरकार के खिलाफ लामबंद किया।
चुनाव में रिकॉर्ड मतदान भी बड़ा फैक्टर बना। 90 प्रतिशत से अधिक मतदान ने “साइलेंट वोटर” को सामने लाया, जो पहले भय या दबाव के कारण मतदान से दूर रहता था। भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती से अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण मतदान संभव हुआ, जिससे सत्ता विरोधी लहर वोट में तब्दील होती दिखी।
भाजपा की रणनीति में भी इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिला। पार्टी ने चुनाव को व्यक्तित्व की लड़ाई बनाने से बचते हुए स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व पर जोर दिया। शुभेंदु अधिकारी को रणनीतिक भूमिका देने और स्थानीय नेताओं को आगे करने का फायदा मिला। वहीं नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सीमित लेकिन प्रभावी प्रचार किया, जिससे ध्रुवीकरण कम हुआ और व्यापक समर्थन जुटाने में मदद मिली।
कुल मिलाकर, एंटी-इंकंबेंसी, युवा असंतोष, उच्च मतदान और बदली हुई चुनावी रणनीति ने मिलकर पश्चिम बंगाल में संभावित सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिख दी है। अब अंतिम परिणाम इस राजनीतिक बदलाव की पुष्टि करेंगे।
