देहरादून। खेतों में बचने वाली पराली अब प्रदूषण का कारण नहीं, बल्कि सड़क निर्माण का महत्वपूर्ण संसाधन बन सकती है। देहरादून स्थित भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (CSIR-IIP) ने केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) के सहयोग से ऐसी स्वदेशी बायो-बाइंडर (बायो-बिटुमेन) तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से कृषि अवशेषों का उपयोग सड़क निर्माण में किया जा सकेगा। यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आयातित बिटुमेन पर देश की निर्भरता कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस तकनीक में धान की पराली सहित अन्य कृषि अवशेषों को विशेष प्रक्रिया (पाइरोलिसिस) के माध्यम से बायो-ऑयल में परिवर्तित किया जाता है। इसके बाद रासायनिक प्रसंस्करण द्वारा इसे बायो-बाइंडर में बदला जाता है, जिसे पारंपरिक बिटुमेन के साथ मिलाकर सड़क निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकता है। परीक्षणों में यह तकनीक गुणवत्ता और मजबूती के मानकों पर सफल साबित हुई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सड़क निर्माण में 15 प्रतिशत तक बायो-बाइंडर का उपयोग किया जाए तो देश को हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। साथ ही, पराली जलाने की समस्या में कमी आने से वायु प्रदूषण घटेगा और किसानों को कृषि अवशेषों से अतिरिक्त आय का स्रोत भी मिलेगा।

भारतीय पेट्रोलियम संस्थान की इस उपलब्धि को ‘वेस्ट टू वेल्थ’ और हरित अवसंरचना की दिशा में बड़ी सफलता माना जा रहा है। इस तकनीक के व्यावसायिक उपयोग के लिए कई उद्योगों को लाइसेंस भी दिए जा चुके हैं, जिससे देशभर में इसके व्यापक इस्तेमाल का मार्ग प्रशस्त होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह नवाचार न केवल पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ सड़क निर्माण को बढ़ावा देगा, बल्कि किसानों, उद्योग और देश की अर्थव्यवस्था तीनों के लिए लाभकारी साबित होगा। आने वाले समय में इस तकनीक के व्यापक उपयोग से भारत स्वच्छ, हरित और आत्मनिर्भर सड़क निर्माण की दिशा में एक नई मिसाल कायम कर सकता है।

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