देहरादून। नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हुए विभिन्न समझौतों और सहयोग पहलों से उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों के लिए विकास और जलवायु अनुकूलन के नए अवसर सामने आए हैं। सम्मेलन में पर्यावरण, जैव विविधता, आपदा प्रबंधन, कृषि और सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया।
BRICS के नई दिल्ली घोषणापत्र में आपदा प्रबंधन के लिए पूर्व चेतावनी तंत्र और डेटा साझा करने से जुड़े प्रयासों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, बाढ़, बादल फटने और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की संवेदनशीलता को देखते हुए ऐसी तकनीक और सूचनाओं का आदान-प्रदान आपदा की तैयारी और त्वरित प्रतिक्रिया में उपयोगी हो सकता है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, BRICS देशों ने आपदा प्रबंधन के लिए Early Warning Data Integration Guidelines पर भी काम किया है।
उत्तराखंड के संदर्भ में हिमनदों की निगरानी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। BRICS देशों के बीच वैज्ञानिक अनुभव और तकनीकी जानकारी साझा होने से हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर और पर्यावरणीय बदलावों की निगरानी से जुड़ी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की संभावनाएं बनती हैं। हालांकि, इन पहलों का वास्तविक लाभ उनके क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर तकनीक के इस्तेमाल पर निर्भर करेगा।
इसके अलावा BRICS देशों ने कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है। नेटवर्क और उत्कृष्टता केंद्रों के माध्यम से पारंपरिक कृषि ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की पहल की गई है। ऐसे सहयोग से उत्तराखंड के मंडुवा, झंगोरा और राजमा जैसे पारंपरिक उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की संभावनाएं भी बन सकती हैं।
घोषणापत्र में जलवायु परिवर्तन से निपटने, अनुकूलन और सतत विकास के लिए वित्तीय व तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। ऐसे में BRICS के तहत होने वाला सहयोग हिमालयी राज्यों के लिए आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकता है।
