देहरादून। उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है, जहां एक ओर जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर औसत से अधिक और अनियमित बारिश नई आपदाओं को जन्म दे रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में कम बारिश और बर्फबारी के कारण जंगल शुष्क हो जाते हैं, जिससे वनाग्नि का खतरा बढ़ जाता है।

प्रदेश के कुल 36,937 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में हर वर्ष आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं। वर्ष 2010 से 2025 के बीच 18,074 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 30 हजार हेक्टेयर से अधिक वन संपदा प्रभावित हुई। वन विभाग के अनुसार पौड़ी गढ़वाल, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिले सबसे अधिक संवेदनशील हैं। मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक ने बताया कि बढ़ता तापमान और ग्लोबल वार्मिंग वनाग्नि के खतरे को और गंभीर बना रहे हैं।

हालिया आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 से 14 फरवरी 2026 तक 61 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें नंदा देवी बायोस्फीयर के जंगल भी प्रभावित हुए। वहीं 15 फरवरी से 21 अप्रैल 2026 के बीच 144 घटनाओं में 85 हेक्टेयर जैव विविधता को नुकसान पहुंचा है।

दूसरी ओर, राज्य में बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है। जुलाई 2025 में 350.2 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो सामान्य 417.8 मिमी से कम थी, जबकि पिछले वर्षों में अधिक वर्षा देखी गई। अगस्त में भी औसत से अधिक बारिश दर्ज की गई है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के अनुसार, कम समय में तेज बारिश से भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं।

पिछले वर्ष हर्षिल, धराली सहित कई क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ, जिससे राज्य में आपदा प्रबंधन की चुनौतियां और बढ़ गई हैं।

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