बार-बार 300 रुपये की पर्ची कटने के बावजूद सदस्यता नहीं मिलने की शिकायतें, पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल; पत्रकारों ने पूछा- क्या प्रेस क्लब कुछ लोगों की स्थायी जागीर बनकर रह गया है?
देहरादून। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार समाज की समस्याओं को सामने लाने, सरकारी व्यवस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और सत्ता से जवाब मांगने का काम करता है। जब किसी नागरिक के अधिकारों का हनन होता है या सरकारी कार्यालय में उसकी फाइल अटकती है, तो पत्रकार उसकी आवाज बनकर सामने आता है। लेकिन जब यही सवाल पत्रकारों के अपने अधिकारों और उनके साझा मंच से जुड़ते हैं, तो स्थिति कुछ अलग नजर आती है। उत्तरांचल प्रेस क्लब की सदस्यता व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवाल इसी विरोधाभास को सामने ला रहे हैं। प्रदेश में ऐसे कई पत्रकार होने की बात कही जा रही है, जो पिछले 15 से 20 वर्षों से लगातार पत्रकारिता कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अब तक प्रेस क्लब की सदस्यता नहीं मिल सकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वर्षों से पत्रकारिता कर रहे लोगों को अपने ही पेशे के साझा मंच का सदस्य बनने के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों करना पड़ रहा है? सदस्यता के लिए आवेदन करने और बार-बार 300 रुपये की पर्ची कटवाने के बावजूद यदि पत्रकारों को कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तो यह केवल व्यक्तिगत परेशानी का विषय नहीं रह जाता, बल्कि संस्था की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है।
प्रेस क्लब का गठन पत्रकारों को एक साझा मंच उपलब्ध कराने, उनके हितों की रक्षा करने और पेशेवर संवाद को मजबूत बनाने के उद्देश्य से किया जाता है। ऐसे में यह संस्था किसी एक पदाधिकारी, समूह या विचारधारा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसमें अलग-अलग समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों, डिजिटल मीडिया संस्थानों और अन्य माध्यमों से जुड़े सक्रिय पत्रकारों की भागीदारी होनी चाहिए। लेकिन जब लंबे समय से काम कर रहे पत्रकार सदस्यता से वंचित होने की शिकायत करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि सदस्यता के लिए निर्धारित मानक आखिर हैं क्या और उनका पालन किस तरह किया जा रहा है?
15-20 साल की पत्रकारिता के बाद भी सदस्यता का इंतजार
उत्तरांचल प्रेस क्लब की सदस्यता को लेकर सामने आ रही शिकायतों में सबसे महत्वपूर्ण पहलू उन पत्रकारों का है, जो लंबे समय से इस पेशे से जुड़े हुए हैं। कई पत्रकारों का दावा है कि उन्होंने अपना पूरा पेशेवर जीवन खबरों के बीच बिताया है। कभी मैदान में रिपोर्टिंग की, तो कभी सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इसके बावजूद उन्हें प्रेस क्लब की सदस्यता नहीं मिल सकी।
सदस्यता के लिए आवेदन करने वाले कुछ लोगों की शिकायत है कि उनसे 300 रुपये की पर्ची कटवाई जाती है। शुल्क जमा करने के बाद भी उन्हें यह स्पष्ट नहीं बताया जाता कि उनका आवेदन किस स्थिति में है। सदस्यता स्वीकार की गई है या आवेदन लंबित है, इस संबंध में भी कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती। ऐसे में आवेदकों के मन में असमंजस बना रहता है।
हालांकि, केवल सदस्यता शुल्क जमा कर देने से किसी व्यक्ति को सदस्यता का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता। संस्था की निर्धारित पात्रता, नियमावली और आवेदन की जांच भी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन यदि किसी आवेदक से शुल्क लिया गया है, तो उसे आवेदन की स्थिति बताना और निर्धारित प्रक्रिया के तहत निर्णय की जानकारी देना भी संस्था की जिम्मेदारी है। आवेदन स्वीकार नहीं होने की स्थिति में उसके कारण स्पष्ट किए जाने चाहिए, ताकि आवेदक को यह पता चल सके कि उसकी कमी कहां रही।
सदस्यता के नियम क्या हैं, किस आधार पर मिलता है प्रवेश?
प्रेस क्लब की सदस्यता व्यवस्था को लेकर सबसे बड़ा सवाल पात्रता के मानकों पर है। क्या सदस्यता देने के लिए पत्रकारिता का अनुभव प्राथमिक आधार है? क्या किसी समाचार पत्र, न्यूज चैनल या डिजिटल मीडिया संस्थान में कार्यरत होने का प्रमाण जरूरी है? क्या नियमित रूप से पत्रकारिता करने और प्रकाशित खबरों को पात्रता का आधार बनाया जाता है? या फिर सदस्यता का रास्ता किसी विशेष पहचान, सिफारिश अथवा प्रभावशाली समूह से होकर गुजरता है?
इन सवालों का जवाब संस्था के संविधान और सदस्यता नियमावली में स्पष्ट रूप से मिलना चाहिए। यदि सदस्यता के लिए निर्धारित नियम मौजूद हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी आवेदकों पर समान मानक लागू हों।
किसी भी संस्था में सदस्यता देने का अधिकार उसकी कार्यकारिणी और नियमों के तहत गठित संबंधित समिति के पास हो सकता है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से होना जरूरी है। यदि किसी आवेदन को अस्वीकार किया जाता है, तो उसका कारण भी लिखित रूप में बताया जाना चाहिए। इससे न केवल आवेदक को अपनी स्थिति समझने में मदद मिलेगी, बल्कि संस्था के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा।
पत्रकारिता में निष्पक्षता, समानता और पारदर्शिता की बात करने वाली संस्था के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि उसकी आंतरिक व्यवस्था भी इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित हो।
300 रुपये की पर्ची का हिसाब कौन देगा?
सदस्यता प्रक्रिया में बार-बार 300 रुपये की पर्ची काटे जाने की शिकायतें भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। यदि किसी पत्रकार से आवेदन या अन्य प्रक्रिया के नाम पर राशि ली जाती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस धनराशि का उपयोग किस मद में किया जाता है। क्या यह आवेदन शुल्क है, सदस्यता प्रक्रिया का खर्च है या किसी अन्य मद में जमा किया जाता है?
इस संबंध में प्रेस क्लब प्रबंधन को स्पष्ट जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए। कितने लोगों से यह शुल्क लिया गया, कितने आवेदन स्वीकृत हुए और कितने अभी भी लंबित हैं? क्या शुल्क जमा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को रसीद दी जाती है? क्या इस राशि का नियमित लेखा-जोखा रखा जाता है?
ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब किसी आरोप-प्रत्यारोप के बजाय दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड के माध्यम से दिया जा सकता है। यदि पूरी प्रक्रिया नियमानुसार चल रही है, तो शुल्क और सदस्यता से संबंधित विवरण सार्वजनिक करने में किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए।
प्रेस क्लब की जमीन और भवन निर्माण भी चर्चा में
उत्तरांचल प्रेस क्लब को लेकर चर्चा केवल सदस्यता तक सीमित नहीं है। क्लब की जमीन और भवन निर्माण का मामला भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रेस क्लब की भूमि पहले नजूल भूमि थी और अब इसे फ्रीहोल्ड कर प्रेस क्लब के नाम किए जाने की बात सामने आई है। भवन निर्माण के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी होने की जानकारी भी दी जा रही है। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू हो सकता है।
यह निश्चित रूप से संस्था के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। पत्रकारों के लिए एक व्यवस्थित भवन, बैठक स्थल, संवाद और अन्य सुविधाओं का विकास संस्था की गतिविधियों को गति दे सकता है। लेकिन भवन निर्माण के साथ यह सवाल भी जुड़ा हुआ है कि इस सुविधा का लाभ किन पत्रकारों को मिलेगा और संस्था में उनकी भागीदारी कितनी व्यापक होगी?
प्रेस क्लब का भवन केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट से तैयार होने वाली संरचना नहीं है। यह पत्रकारों के सामूहिक हितों, संवाद और एकजुटता का केंद्र होना चाहिए। इसलिए भूमि के फ्रीहोल्ड होने, स्वामित्व संबंधी दस्तावेजों, निर्माण की स्वीकृतियों, टेंडर की शर्तों और खर्च से जुड़ी जानकारी को भी नियमानुसार पारदर्शी रखा जाना चाहिए।
भवन बनना किसी भी संस्था के लिए उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसकी असली मजबूती सदस्यों के विश्वास से तय होती है। यदि एक ओर नया भवन तैयार हो रहा हो और दूसरी ओर सक्रिय पत्रकार सदस्यता के लिए भटक रहे हों, तो संस्था के विकास की दिशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या सदस्यता कुछ लोगों तक ही सीमित रह गई है?
उत्तराखंड राज्य गठन के बाद से प्रेस क्लब की कार्यशैली और सदस्यता व्यवस्था को लेकर समय-समय पर सवाल उठने की बात कही जाती रही है। हालांकि, इन शिकायतों की वास्तविकता का निष्पक्ष आकलन संबंधित दस्तावेजों, नियमों और पदाधिकारियों के पक्ष को सामने रखकर ही किया जाना चाहिए। किसी संस्था के पूरे इतिहास को केवल आरोपों के आधार पर गलत ठहराना उचित नहीं है, लेकिन लंबे समय से उठ रही शिकायतों को नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं हो सकता।
यदि कुछ पत्रकारों को यह महसूस हो रहा है कि सदस्यता सीमित लोगों तक सिमटकर रह गई है, तो इस धारणा को दूर करना प्रेस क्लब की जिम्मेदारी है। सदस्यता के लिए पात्रता सभी के लिए एक जैसी होनी चाहिए। किसी पत्रकार का समाचार संस्थान, उसकी राजनीतिक विचारधारा, व्यक्तिगत पहचान या किसी पदाधिकारी से नजदीकी सदस्यता का आधार नहीं बननी चाहिए।
इसी तरह, यदि किसी ऐसे व्यक्ति को सदस्यता दिए जाने की शिकायत सामने आती है जिसकी सक्रिय पत्रकारिता पर सवाल हैं, तो उस मामले की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। किसी व्यक्ति विशेष पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सदस्यता का आधार पेशेवर सक्रियता, अनुभव और संस्था के निर्धारित नियम ही हों।
प्रेस क्लब को ऐसा मंच बनना चाहिए, जहां प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया से जुड़े पत्रकार बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे के साथ संवाद कर सकें। पत्रकारिता के बदलते स्वरूप में डिजिटल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में सदस्यता के मानकों में भी सभी माध्यमों से जुड़े वास्तविक और सक्रिय पत्रकारों को उचित स्थान मिलना चाहिए।
कार्यकारिणी को सार्वजनिक करने चाहिए सदस्यता से जुड़े आंकड़े
सदस्यता व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों के बीच प्रेस क्लब की कार्यकारिणी और संबंधित पदाधिकारियों से कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक करने की अपेक्षा की जा रही है।
सबसे पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वर्तमान में सदस्यता के लिए कौन-कौन से नियम लागू हैं और उनकी जानकारी पत्रकारों को कहां उपलब्ध है। पिछले पांच वर्षों में कितने नए सदस्यता आवेदन प्राप्त हुए, उनमें से कितनों को मंजूरी दी गई और कितने आवेदन अब भी लंबित हैं, इसका विवरण सामने आना चाहिए।
इसके अलावा 300 रुपये की पर्ची के माध्यम से ली जाने वाली राशि किस मद में जमा की जाती है और उसका लेखा-जोखा किस प्रकार रखा जाता है, इसकी जानकारी भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जिन आवेदकों की सदस्यता स्वीकार नहीं की गई, क्या उन्हें लिखित रूप में कारण बताए गए? क्या आवेदन की स्थिति जानने के लिए कोई निर्धारित व्यवस्था है? क्या सदस्यता संबंधी निर्णय के खिलाफ अपील करने का अवसर दिया जाता है?
इन सवालों का जवाब मिलने से सदस्यता प्रक्रिया को लेकर बनी अनिश्चितता दूर हो सकती है। जरूरत पड़ने पर सदस्यता व्यवस्था की समीक्षा के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष समिति भी गठित की जा सकती है। यह समिति आवेदन प्रक्रिया, पात्रता, शुल्क और लंबित मामलों की जांच कर निर्धारित समयसीमा में अपनी रिपोर्ट दे सकती है।
समयबद्ध सदस्यता प्रक्रिया से दूर हो सकता है विवाद
प्रेस क्लब की कार्यकारिणी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संस्था के प्रति पत्रकारों का विश्वास बनाए रखने की है। इसके लिए जरूरी है कि सदस्यता प्रक्रिया को व्यवस्थित और समयबद्ध बनाया जाए। आवेदन प्राप्त होने के बाद उसकी जांच के लिए निश्चित समयसीमा तय होनी चाहिए। पात्रता पूरी करने वाले पत्रकारों के आवेदन पर समय से निर्णय लिया जाना चाहिए और किसी भी तरह की कमी होने पर आवेदक को इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।
यदि आवेदन अस्वीकार किया जाता है, तो उसके पीछे ठोस कारण लिखित रूप में बताए जाने चाहिए। साथ ही अपील की व्यवस्था भी होनी चाहिए, जिससे किसी आवेदक को यह महसूस न हो कि उसके पास अपनी बात रखने का कोई रास्ता नहीं है।
सदस्यता सूची और शुल्क से संबंधित विवरण भी संस्था के नियमों तथा लागू गोपनीयता प्रावधानों के अनुरूप पारदर्शी बनाए जाने चाहिए। इससे न केवल वर्तमान विवादों का समाधान संभव होगा, बल्कि भविष्य में भी ऐसी परिस्थितियां पैदा होने से रोकी जा सकेंगी।
उत्तराखंड में पत्रकारों के कई संगठन सक्रिय हैं और प्रत्येक संगठन की अपनी भूमिका है। लेकिन उत्तरांचल प्रेस क्लब का महत्व इस बात में है कि वह सभी पत्रकारों के लिए एक साझा मंच के रूप में अपनी पहचान बनाए। यहां पत्रकारों को अपनी समस्याएं रखने, पेशेवर मुद्दों पर चर्चा करने और आपसी सहयोग बढ़ाने का अवसर मिलना चाहिए।
भवन से ज्यादा जरूरी है संस्था के प्रति भरोसा
जो पत्रकार पिछले 15-20 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे हैं और अब भी प्रेस क्लब की सदस्यता का इंतजार कर रहे हैं, उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए। यह किसी एक व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष का मामला नहीं, बल्कि संस्था की कार्यप्रणाली और विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है।
प्रेस क्लब के पदाधिकारियों और सदस्यों को इस मुद्दे को व्यक्तिगत विवाद के रूप में देखने के बजाय व्यवस्था में सुधार के अवसर के तौर पर लेना चाहिए। यदि सदस्यता प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो उसके दस्तावेज और आंकड़े सामने रखे जाएं। यदि कहीं कोई कमी है, तो उसे दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
आखिर प्रेस क्लब किसी की निजी जागीर नहीं, बल्कि पत्रकारों के सामूहिक हितों का मंच है। इसकी सदस्यता किसी पदाधिकारी की व्यक्तिगत कृपा या सिफारिश पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। पात्रता, अनुभव और निर्धारित नियम ही इसका आधार होने चाहिए।
प्रेस क्लब की नई इमारत तैयार होगी तो उसकी दीवारें, कमरे और सुविधाएं दिखाई देंगी, लेकिन संस्था की वास्तविक पहचान उसके भीतर होने वाले व्यवहार से बनेगी। भवन की नींव मजबूत करने के साथ सदस्यता की नींव को भी निष्पक्षता, पारदर्शिता और समानता पर रखना होगा।
अब सवाल उत्तरांचल प्रेस क्लब की कार्यकारिणी से है कि क्या वह 15-20 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे उन लोगों के लिए भी अपने दरवाजे खोलेगी, जो लंबे समय से सदस्यता का इंतजार कर रहे हैं? या फिर सदस्यता को लेकर उठते सवाल यूं ही अनुत्तरित रहेंगे? जिस संस्था से जुड़े पत्रकार दूसरों से जवाब मांगते हैं, क्या वह खुद अपनी जवाबदेही तय करने के लिए तैयार है?
