रिपोर्टर – राजपाल बिष्ट
देहरादून। उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाओं के लिए बनाई जा रही सुरंगें लगातार हादसों का कारण बन रही हैं। चमोली की विष्णुगाड-पीपलकोटी जल विद्युत परियोजना की टनल में हालिया हादसे में सात श्रमिकों की मौत और तीन के लापता होने की घटना ने एक बार फिर निर्माणाधीन सुरंगों में श्रमिकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार हो रही ऐसी घटनाओं से मजदूरों के साथ उनके परिजनों की चिंता भी बढ़ती जा रही है।
उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाओं के अलावा रेल और सड़क परियोजनाओं के लिए भी लंबे समय से सुरंगों का निर्माण हो रहा है। चमोली की विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के निर्माण के दौरान भी सुरंग में कई मजदूर हादसे का शिकार हुए थे। इसके बाद वर्ष 2021 में रैणी क्षेत्र में आई भीषण आपदा ने तपोवन-विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना को भारी नुकसान पहुंचाया। सुरंग में पानी और मलबा भरने से बड़ी संख्या में मजदूर और कर्मचारी लापता हो गए थे।
इसके बाद वर्ष 2023 में उत्तरकाशी की सिलक्यारा-बड़कोट सुरंग हादसा भी देशभर में चर्चा का विषय बना। 12 नवंबर को सुरंग में 41 मजदूर फंस गए थे। करीब 17 दिन तक चले कठिन रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद 28 नवंबर को सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इस अभियान ने सुरंगों में बचाव व्यवस्था और आपदा प्रबंधन की अहमियत को सामने रखा।
अब विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना की घटना ने फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। भूधंसाव और पानी के रिसाव से हुए हादसे में कई श्रमिकों की जान चली गई, जबकि कुछ अभी भी लापता हैं। मृतकों में टिहरी के प्रदीप पंवार भी शामिल हैं, जिनकी हाल ही में शादी हुई थी। उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
उत्तराखंड भूकंपीय और आपदा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। ऐसे में हिमालयी भूगोल को ध्यान में रखते हुए विकास परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन और वैज्ञानिक निगरानी बेहद जरूरी है। राहत-बचाव में तेजी के साथ भविष्य में ऐसे हादसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाना भी सरकार और परियोजना एजेंसियों की बड़ी जिम्मेदारी है।
