नैनीताल। उत्तराखंड में हर साल गर्मियों के दौरान जंगलों में लगने वाली आग को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। वनाग्नि पर स्वतः संज्ञान से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है कि पिछले एक दशक में जंगलों की आग रोकने को लेकर अदालत की ओर से जारी निर्देशों का कितना पालन हुआ। कोर्ट ने सरकार को अनुपालन रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में अदालत ने वनाग्नि की रोकथाम के लिए किए गए प्रयासों की जानकारी मांगी। इससे पहले हाईकोर्ट ने वन विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते हुए निर्देश दिया था कि निर्धारित समय में आदेशों का पालन नहीं होने पर संबंधित अधिकारी इसके लिए जिम्मेदार होंगे।
राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों ने हाईकोर्ट के पुराने आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि आदेश उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हाईकोर्ट के आदेश को संशोधित करते हुए प्रकरण पर दोबारा सुनवाई करने और पूर्व आदेश का भी अवलोकन करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद हाईकोर्ट ने सरकार से दस साल में हुए अनुपालन का ब्योरा मांगा है।
सुनवाई के दौरान पर्यावरण से जुड़े लोगों की ओर से जंगलों की आग रोकने के लिए प्राथमिक स्तर पर प्रभावी कदम उठाने की जरूरत बताई गई। इसके तहत वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को जागरूक करने, वन विभाग की ओर से अभियान चलाने और कैंप फायर व बोन फायर पर प्रभावी रोक लगाने की मांग की गई।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि कॉर्बेट क्षेत्र में कई रिसॉर्ट और होमस्टे पर्यटकों के मनोरंजन के लिए बोन फायर का इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा वन विभाग के कई डाक बंगले भी उपयोग में नहीं हैं। अदालत ने संकेत दिया कि यदि पुराने निर्देशों का प्रभावी अनुपालन हुआ होता तो वर्ष 2021 के बाद वनाग्नि की घटनाओं में कमी आ सकती थी।
