देहरादून। उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी वास्तविक आत्मा यहां की आध्यात्मिक परंपराओं, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक सहअस्तित्व में निहित है। चारधाम और हेमकुंट साहिब यात्राएं सदियों से इस साझा विरासत का प्रतीक रही हैं, जिन्होंने विभिन्न आस्थाओं के लोगों को एक सूत्र में बांधते हुए भाईचारे और सहयोग की परंपरा को मजबूत किया है।
हाल के दिनों में कुछ घटनाओं के बाद सामाजिक और डिजिटल मंचों पर विभाजनकारी माहौल बनाने की कोशिशों के बीच प्रदेश की इस गौरवशाली विरासत को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। वक्ताओं का कहना है कि राजनीतिक या तात्कालिक कारणों से यदि सामाजिक सौहार्द प्रभावित होता है, तो इसका असर न केवल समाज बल्कि राज्य की पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
चारधाम और हेमकुंट साहिब यात्राओं का प्रमुख प्रवेश द्वार ऋषिकेश है। केदारनाथ, बद्रीनाथ और हेमकुंट साहिब जाने वाले श्रद्धालु एक ही यात्रा मार्ग और सुविधाओं का उपयोग करते हैं। यात्रा के दौरान स्थानीय समुदाय, गुरुद्वारे, मंदिर समितियां, स्वयंसेवी संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर सेवा, सहयोग और अतिथि सत्कार की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जो उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
इतिहास भी इस समरसता की मिसाल प्रस्तुत करता है। चमोली जिले के भ्यूंडार गांव निवासी स्वर्गीय नंदा सिंह हेमकुंट साहिब गुरुद्वारे के प्रथम ग्रंथी रहे और उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इस दायित्व का निर्वहन किया। उनका योगदान उत्तराखंड की समावेशी संस्कृति और विभिन्न आस्थाओं के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है।
चारधाम और हेमकुंट साहिब यात्राएं धार्मिक महत्व के साथ-साथ राज्य की अर्थव्यवस्था की भी मजबूत आधारशिला हैं। परिवहन, होटल, होम-स्टे, घोड़ा-खच्चर संचालन और स्थानीय व्यापार सहित हजारों परिवारों की आजीविका इन यात्राओं पर निर्भर है।
ऐसे में समाज के सभी वर्गों से उत्तराखंड की सदियों पुरानी शांति, सहिष्णुता और भाईचारे की परंपरा को बनाए रखने तथा देवभूमि की साझा आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए मिलकर प्रयास करने की अपील की गई है।
