रिपोर्टर– अनिल बहुगुणा

पौड़ी गढ़वाल। उत्तराखंड की राजनीति में मातृशक्ति को हमेशा से चुनावी नतीजों का महत्वपूर्ण निर्णायक माना जाता रहा है। रक्षाबंधन के मौके पर पौड़ी गढ़वाल में भाजपा और कांग्रेस की ओर से आयोजित कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में महिलाओं की मौजूदगी ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी चर्चाओं को तेज कर दिया है। दोनों दलों के कार्यक्रमों में खचाखच भरे सभागार यह संकेत दे रहे हैं कि महिला मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश तेज हो गई है।

भाजपा की रणनीति में सरकारी योजनाओं, डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों और संगठन की मजबूत जमीनी पकड़ को प्रमुखता दी जा रही है। महिला स्वयं सहायता समूहों, आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और मंडल स्तर के संगठन के जरिए पार्टी महिला मतदाताओं से संपर्क मजबूत करने में जुटी है। वहीं, कांग्रेस सत्ता विरोधी रुझान, बेरोजगारी, महंगाई, स्थानीय रोजगार और अंकिता भंडारी प्रकरण जैसे मुद्दों के जरिए महिलाओं के बीच अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है।

रक्षाबंधन के कार्यक्रमों में दोनों दलों की ओर से महिलाओं को उपहार और सम्मान देकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी नजर आई। साड़ी, मिठाई और विकास कार्यों के भरोसे के जरिए महिला मतदाताओं को जोड़ने का प्रयास किया गया। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या कार्यक्रमों में उमड़ी भीड़ मतदान के दिन वोट बैंक में तब्दील होगी?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, किसी कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं की मौजूदगी को सीधे किसी दल के पक्ष में वोट मानना जल्दबाजी होगी। पहाड़ की महिलाएं सामाजिक और राजनीतिक रूप से जागरूक मतदाता मानी जाती हैं। वे रक्षाबंधन जैसे सामाजिक आयोजनों में शामिल होकर उपहार स्वीकार कर सकती हैं, लेकिन मतदान के समय स्वास्थ्य, शिक्षा, महंगाई, सड़क, पलायन और बच्चों के रोजगार जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं।

ऐसे में पौड़ी में उमड़ी मातृशक्ति की भीड़ फिलहाल दोनों दलों के लिए उत्साह का संकेत जरूर है, लेकिन असली परीक्षा चुनाव के समय होगी। जीत उसी दल की होगी जो उपहार और आयोजनों से आगे बढ़कर महिलाओं का भरोसा वास्तविक मुद्दों पर जीत सके।

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