देहरादून। उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध तुंगनाथ-चोपता क्षेत्र में बढ़ता प्लास्टिक कचरा अब गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय बन गया है। हर साल हजारों श्रद्धालु, ट्रेकर्स और पर्यटक इस क्षेत्र का रुख करते हैं, लेकिन उनके पीछे छोड़ा गया प्लास्टिक कचरा हिमालयी बुग्यालों की प्राकृतिक सुंदरता और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है। पर्यावरणविदों ने इसे भविष्य के लिए बड़ा खतरा बताया है।

जानकारों के अनुसार, तुंगनाथ मंदिर और चंद्रशिला ट्रेक मार्ग पर प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य सामग्री के रैपर, पॉलीथीन और अन्य गैर-जैविक कचरा बड़ी मात्रा में देखा जा रहा है। इससे न केवल क्षेत्र की स्वच्छता प्रभावित हो रही है, बल्कि वन्यजीवों और हिमालयी वनस्पतियों पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इस संवेदनशील क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ सकता है।

स्थानीय लोगों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों ने प्रशासन से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को मजबूत करने, प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण लगाने और पर्यटकों में जागरूकता बढ़ाने की मांग की है। हाल ही में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा तुंगनाथ-चंद्रशिला क्षेत्र में व्यापक सफाई अभियान चलाकर सैकड़ों किलोग्राम प्लास्टिक कचरा भी एकत्र किया गया, जिससे समस्या की गंभीरता सामने आई।

विशेषज्ञों का मानना है कि तुंगनाथ-चोपता जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों की प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए प्रशासन, स्थानीय समुदाय और पर्यटकों को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी। तभी देवभूमि की यह अमूल्य विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सकेगी।