चंद्र प्रकाश बुड़ाकोटी

उत्तराखण्ड के जंगलों में पिछले कई दिनों से लगी आग के कारण करोड़ो रूपये की बन संपदा खाक हो गई है। लाचार महकमे द्वारा इस पर काबू पाने के प्रयास तो काफी किए जा रहे हैं पर फिलहाल अभी तक सफलता नहीं मिली है।राज्य में सरकारी आंकड़ों की बात करे तो नौ सौ तेरासी जगहों पर आग लगी हुई है,इसमें बारह सौ बयासी हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है,हजारो हेक्टेयर पेड़ वन संपदा जलकर खाक हो चुकी है,हजारो जंगली पशु पक्षी हताहत होने की खबरे है।अब सीएम तीरथ रावत खुद एक्टीब मोड़ में आ गए है,केंद्र से भी दो हेलीकाप्टर बनाग्नि को बुझाने को मिले है। छिटपुट आग तो हर साल लगती है और तीव्रता के लिहाज से देखें,हर चार-पांच साल में ऐसी भयंकर आग लगती ही रहती है। लेकिन,इस बार की आग समय से कुछ पहले लगी और इसकी व्यापकता भी काफी अधिक है। उत्तरकाशी,बागेश्वर,पौड़ी टिहरी,हरिद्वार, नैनीताल,सहित राज्य के तकरीबन सभी जिले और नागरिकों की अग्नि परीक्षा है।

होती है मानवीय असावधानी

जंगल में कैसे लगी आग, इसका पता लगना कठिन है क्योंकि जंगल में आग लगने के कई कारण हो सकते हैं। एक तो खेत में लगी मामूली आग, कई बार हवा से जंगल तक चली जाती है। कई बार शिकारी भी वन में आग लगा देते हैं। वनोपज की तस्करी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। कई बार ऐसा भी होता है कि चलती बस से किसी यात्री ने जलती हुई तीली ही जंगल की ओर फेंक दी और इससे दहकी आग बेकाबू हो गई। कुल मिलाकर 99.99 फीसदी मानवीय असावधानी से ही आग लगती है। उत्तराखंड के मामले में भी मानवीय असावधानी ही आग कारण बनी, सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

आपदा से बचाव के प्रयास

एक समय था जबकि तेज गर्मी में आग की आशंका के मद्देनजर वन अधिकारी पहले से योजनाएं तैयार कर लिया करते थे। ये योजनाएं नवंबर-दिसंबर में ही तैयार हो जाती थीं। वन अधिकारी ऐसे होते थे, उन्हें जंगल के अधिकतर वृक्षों की जानकारियां होती थीं।वे वनों के आसपास के गांवों के लोगों और वन विभाग के कर्मचारियो के साथ योजनाएं तैयार करते थे और अप्रिय परिस्थिति से निपटने की योजना को अमल में लाते थे। लेकिन, अब आपदा प्रबंधन को लेकर ठोस योजनाएं तैयार नहीं की जातीं। केवल आग से ही नहीं बल्कि अतिवृष्टि से भी बचने की योजनाएं बनाई जाती थीं। महिलाएं अपने गांवों में दो-तीन घंटे अतिरिक्त काम करके पत्थर की दीवार बनाकर अतिवृष्टि से बचाव कर लिया करती थी। अब ग्रामीणों का जंगल से वैसा जुड़ाव नहीं रह गया है जैसा कि पहले हुआ करता था। लोगों को लगता है कि जंगल उनके नहीं सरकार के हैं और इसमें आग लगे या कुछ भी नुकसान हो, उससे निपटने की जिम्मेदारी भी सरकार की है। वे आगे बढ़कर वन को बचाने के काम में सहायता के लिए नहीं आते।

आग लगने और फैलने के कारण

जंगलों में सबसे पहले जमीन पर गिरे पत्तों में आग लगती है। इस बार सर्दियों में बारिश नहीं होने से उत्तराखण्ड के जंगलों में जमीन में नमी नहीं बची थी। मार्च-अप्रेल में तापमान अधिक होने से पत्ते अधिक गिरे।चीड़ जैसे पेड़ों की प्रजातियां मध्य हिमालय में होती हैं। इन्हें निचले इलाकों में नहीं होना चाहिए क्योंकि हवा चलने के साथ ये तेजी से आग पकड़ते हैं। बड़ी संख्या में निचले इलाकों में इन्हें रोपित किया गया ।

वन अफसरों की वन कार्यो में नही है रुचि

उतराखण्ड की बात की जाय तो संसाधन बिहीन सिर्फ छोटे अफसरों कर्मचारियों के भरोसे वनों की रक्षा हो रही है।जबकि बड़े आईएफएस वन सेवा से आये अफसरो की वन कार्यो में रुचि नही है,राज्य में अधिकांश वन सेवा के अफसर अन्य प्रोजेक्टों, परिषदों,बोर्डो,निगमो में वन से ज्यादा सेवा देना पसंद करते है।जबकि होना यह चाहिए था कि इनकी योग्यता और महारथ वन सेवा में है,उसका सदपुयोग होता।सरकार को चाहिए कि वन से इतर सालो से डटे अफसरों को वन बिभाग में वापिस बुला इनकी जिम्मेदारी तय करे ।

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