शंखनाद INDIA/अल्मोड़ा-: ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किए गए जुल्म के परिणाम स्वरूप कुली बेगार आंदोलन का जन्म हुआ। इस आंदोलन के जरिए जहां अंग्रेजों को लोगों की एकजुटता और समर्पण का अहसास हुआ। वहीं इस आंदोलन के जरिए कुमाऊं का नाम पूरे विश्वपटल तक पहुंचा।

कुली बेगार आंदोलन पर एसएसजे परिसर में आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. नरेंद्र भंडारी ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि कुमाऊं क्षेत्र से उठा यह आंदोलन आज भी कुली बेगार की कुप्रथा का स्मरण कराता है। उन्होंने कहा कि उस दौर में इस आंदोलन से कई हस्तियां बागेश्वर के सरयू बगड़ पहुंची थी। प्रो. अनिल जोशी ने कहा कि इस आंदोलन में स्व. बद्रीनाथ पांडे की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कर्नल रवि पांडे ने कहा कि उस समय उत्तरायणी के पर्व पर रजिस्टर को बहाना एक बड़ी घटना थी।

साहित्यकार सुशील जोशी ने कहा कि समाज सेवी और पत्रकार स्व. बद्री दत्त पांडे के सहयोग से बुद्धि बल्लभ पांडे ने फॉर्मल एजुकेशन के लिए काम किया और इल्बर्ट बिल का विरोध भी किया। उन्होंने कहा कि बद्री दत्त पांडे ने उस दौर में अल्मोड़ा अखबार में कई क्रांतिकारी लेख लिखे और बाद में अखबार के तेवर देखकर ब्रिटिश दबाव में उसे बंद करना पड़ा था।

प्रो. एसए हामिद ने कहा कि कुली बेगार आंदोलन नॉन वायलेंट मूवमेंट रहा । गोष्ठी के डा. चंद्र प्रकाश फुलोरिया, डा. कपिलेश भोज, डा. वसुधा पंत, ललित योगी, गिरीश मेहरोत्रा, प्रेमा बिष्ट, किरन तिवारी ने भी संबोधित किया और कुली बेगार आंदोलन से सीख कर आगे काम करने की वकालत की।

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