ऊखीमठ। तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ की यात्रा का प्रथम प्रमुख पड़ाव भुजगली बुग्याल इन दिनों श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। हिमालय की गोद में बसा यह सुरम्य बुग्याल अपने मखमली घास के मैदानों, रंग-बिरंगे हिमालयी पुष्पों, शीतल हवाओं और हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के मनमोहक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है।

चोपता से तुंगनाथ धाम की पैदल यात्रा शुरू होते ही कुछ दूरी पर स्थित भुजगली बुग्याल यात्रियों का स्वागत अपनी प्राकृतिक छटा से करता है। यही कारण है कि इसे तुंगनाथ यात्रा का पहला विश्राम स्थल भी माना जाता है। यहां कुछ देर विश्राम करने के बाद श्रद्धालु नई ऊर्जा के साथ आगे की चढ़ाई के लिए रवाना होते हैं।

वसंत, मानसून और शरद ऋतु में भुजगली का सौंदर्य अपने चरम पर होता है। सुबह की सुनहरी धूप और शाम के समय हिमालयी चोटियों पर बिखरती लालिमा पूरे क्षेत्र को अलौकिक आभा प्रदान करती है। साफ मौसम में यहां से हिमालय की कई ऊंची चोटियों के मनोरम दर्शन होते हैं, जो पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

भुजगली बुग्याल प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ हिमालयी जैव विविधता का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां कस्तूरी मृग, मोनाल, हिमालयी लोमड़ी सहित अनेक दुर्लभ वन्यजीव और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है। पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग और स्थानीय लोग समय-समय पर स्वच्छता एवं जागरूकता अभियान भी चलाते हैं।

तुंगनाथ यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों से स्थानीय युवाओं को घोड़ा-खच्चर सेवा, होमस्टे, भोजनालय और स्थानीय उत्पादों की बिक्री के माध्यम से रोजगार मिल रहा है, जिससे क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।

केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग, ऊखीमठ-गुप्तकाशी रेंज के रेंज अधिकारी विमल कुमार भट्ट ने कहा कि भुजगली बुग्याल हिमालय की अमूल्य प्राकृतिक धरोहर है, जहां प्रकृति ने सौंदर्य और शांति का अनुपम संगम रचा है। उन्होंने बताया कि बुग्यालों के संरक्षण और संवर्धन के लिए विभाग निरंतर प्रयास कर रहा है। वहीं, प्रकृति प्रेमी अनिल जिरवाण ने कहा कि हिमालय केवल पर्वतों का समूह नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और प्रकृति का जीवंत स्वरूप है, जिसकी स्वच्छता और जैव विविधता को सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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