उत्तरकाशी। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली में पिछले वर्ष आई विनाशकारी आपदा के दौरान मलबे में दबे प्राचीन कल्प केदार मंदिर को बाहर निकालने की कवायद शुरू हो गई है। करीब 14 महीने बाद ग्रामीणों ने मंदिर के जीर्णोद्धार और उसे मलबे से बाहर निकालने के लिए खुदाई का काम शुरू किया है। शारदीय नवरात्र के पहले दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और हवन के बाद यह कार्य शुरू किया गया। मंदिर की खोज को क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
समेश्वर देवता की डोली के सानिध्य में शुरू हुआ कार्य
धराली गांव के ग्रामीणों ने अपने आराध्य समेश्वर देवता की डोली के सानिध्य में मंदिर की खुदाई शुरू की। इससे पहले मंदिर समिति और ग्रामीणों ने पूजा-पाठ और हवन किया। ग्रामीणों के अनुसार, आपदा की पहली बरसी पर पांच अगस्त को उन्होंने समेश्वर देवता से मंदिर की खुदाई शुरू करने के लिए दिन निर्धारित करने की प्रार्थना की थी। इसके बाद नवरात्र के पहले दिन खुदाई शुरू करने का निर्णय लिया गया।
कल्प केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेश पंवार के अनुसार, फिलहाल ग्रामीण अपने संसाधनों से खुदाई करा रहे हैं। मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी घोषणा कर चुके हैं। समिति जल्द ही मुख्यमंत्री से मुलाकात कर मंदिर को मलबे से बाहर निकालने और उसके पुनर्निर्माण के संबंध में चर्चा करेगी।
इतिहास में चौथी बार मंदिर की तलाश
कल्प केदार मंदिर का इतिहास प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ा रहा है। मंदिर समिति के सदस्यों के मुताबिक, वर्ष 1803 में आई आपदा के दौरान बाढ़ में मंदिर बह गया था। उस समय यहां लगभग 204 मंदिरों का समूह होने की बात कही जाती है। वर्ष 1887 में यहां तीन मंदिर दिखाई दिए थे। इसके बाद वर्ष 1926 में आई आपदा के दौरान मुख्य कल्प केदार मंदिर आंशिक रूप से जमीन में दब गया था, जबकि अन्य छोटे मंदिर बह गए थे। उस समय ग्रामीणों ने खुदाई कर मुख्य मंदिर को बाहर निकाला था।
करीब एक सदी बाद अगस्त 2025 में खीर गंगा में आई भीषण बाढ़ ने धराली में भारी तबाही मचाई। इस दौरान प्राचीन कल्प केदार मंदिर का गुंबद क्षतिग्रस्त हो गया और मंदिर का गर्भगृह तथा परिसर मलबे में दब गए। ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर लगभग 25 फीट मलबे के नीचे दबा हुआ है।
अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि खुदाई के जरिए इस ऐतिहासिक मंदिर को फिर से सामने लाया जा सकेगा। इससे क्षेत्र की धार्मिक पहचान और प्राचीन विरासत को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
