भरत झुनझुनवाला/
भारत का भूखंड एक भीमकाय पत्थर की चट्टान पर टिका हुआ है, जिसे ‘इडियन प्लेट’ कहते है। यह प्लेट धीरे-धीरे उत्तर की ओर खिसक रही हैं, जहां वह तिब्बत की प्लेट से हिमालय,विशेषकर उत्तराखण्ड का क्षेत्र भूकंप से पीड़ित रहा है। पिछले 20 वर्षो को छोड़ दे तो लगभग हर दस वर्षों के दौरान उत्तराखण्ड मे एक भूकंप आता रहा हे। पिछले 20 वर्षों में कोई बडा़ भूकंप न आने का कारण यह हो सकता है कि टिहरी बांध में पानी के भारी भडांरण से इन दोनों प्लेटों के टकराव के बीच एक दबाव बन गया हो, जो उन्हें टकराने से रोक रहा हों। हालंकि भारतीय प्लेट उत्तर की ओर खिसक तो रही ही है। इसका दबाव भी बन रहा है और इससे आने वाले समय में भूकंप की आंशका बनी हुई है। गत रविवार को ऋषिगंगा में ग्लेशियर का स्खलन ऐसे टकराव से उत्पन्न कंपन के कारण हुआ हो सकता है। इसमें ऋषिगंगा के नीचे तपोवन विष्णुगाड परियोजना की सुरंग बनाने के लिए किए गए विस्फोटों से उत्पन्न कंपन की भूमिका भी हो सकती है। यद्यपि वैज्ञानिकों की राय है कि विस्फोट की तंरगें दूर तक  नहीं    जाती । फिर भी सूक्ष्म तंरगों का ग्लेशियर पर प्रभाव हमें ज्ञात नहंीं है।
माना जाता है कि ग्लोबल वार्मिग के कारण हमारे ग्लेशियर कमजोर हो रहे है। इसी कारण यह कहा जाता है कि ऐसी घटनाओं की आवृति होती रहेगी। हरिद्वार से गंगा द्वारा नीचे ले जाने से बना है । इसलिए इस प्रकार की घटनाओं को पौधारोपण अथवा अन्य तरीकां से रोकना संभव नहीं दिखता। पिछले कुछ अर्से से उत्तराखण्ड की त्रासदिंयों में जलविद्युत परियोजनाओं की भी भूमिका मानी जाती है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित रवि चोपडा़ कमेटी में बताया था कि 2013 की आपदा में नुकसान केवल जल विद्युत परियोजनाओं के ऊपर और नीचे हुआ है। जल विद्युत परियोजनाओ द्वारा नदी के बहाव को रोकने से दुर्घटना घटती है। यदि ऋषिगंगा एवं तपोवन में बैराज न बनाया जा रहा होता तो ग्लेशियर का मलबा सहज ही सीधे गंगासागर तक निकल जाता और यह त्रासदी न घटती । बिल्कुल वैसे ही जैसे 2013 में चैराबारी ग्लेशियर से निकले मलबे को फाटा-व्यूगं, सिंगोली-भटवाडी और श्रीनगर परियोजनाओं ने न रोका होता तो त्रासदी होती ही नहीं। इस प्रकार तपोवन -विष्णुगाड परियोजना द्वारा मलबे के रास्तंे में बनाए बए बैराज के अवरोध के कारण यह त्रासदी हुई है, न कि ग्लेशियर के फटने के कारण। संकटग्रस्त तपोवन-विष्णुगाड परियोजना के नीचे विष्णुगाड-पीपलकोटि परियोजना निर्माणाधीन है औार उसके नीचे श्रीनगर परियोजना ने अलकनन्दा का रास्ता रोक रखा है। अतः आने वाले समय में संकट के बादल मंडराते रहेंगे।
वर्तमान मे जलविद्युत परियोजनाएं आर्थिक दृष्टि से अप्रासंगिक हो गई है। नई परियोजनाओं से निर्मित विजली की कीमत वर्तमान मे 7 से 10 रूपये प्रति यूनिट पड़ रही है।, जो सौर ऊर्जा की तुलना में तीन गुनी है। हालंकि सौर ऊर्जा दिन में उत्पादित होती है जबकि बिजली का जरूरत सुबह और श्याम होती है। फिर भी दिन की ऊर्जा को सुबह और श्याम की ऊर्जा में परिवर्तित करने का खर्च मात्र 50 पैसे प्रति यूनिट आता है । इसलिए सुबह और श्याम की सौर ऊर्जा 4 रूप्ये में आसानी से उपलब्ध हो सकती है । इसके अतिरिक्त जल विद्युत परियोजनाओं का हमारी परिस्थितिकी पर दुष्प्रभाव पड़ता है। नेशनल एन्वायरमंेट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीटयूट, नागपुर के अनुसार यमुना और नर्मदा की तुलना में गंगा में फाज नाम के वायरस दस गुना अधिक पाए जाते हैं। इनकें रोग नाशक क्षमता अधिक पाए जाते है। इनमें रोग नाशक क्षमता हेाती है। गंगा के पानी में तांबा और रेडियोधर्मी थोरियम भी पाया जाता है, जो कीटाणुओं को नष्ट करतें हैं।

गंगा में ये विशेष गुण पानी के पत्थरों से रगड़ कर बहने से उत्पन्न होते है। जलविद्युत परियोजनाओं से गंगा के पानी का पत्थरों के साथ घर्षण समाप्त होता है और मछलियों की आवाजाही भी बधित होती है। यदि इस पर्यावरणीय हाानि के मुल्य को जल विद्युत के मूल्य में जोड़ दिया जाए तो मेरे अनुमान स ेजल विद्युत की उत्पादन लागत 18 रूपये प्रति युनिट आएगी। फिर भी सरकार इन परियोजनाअेां के प्रति प्रतिबद्ध है। उनके लिए आर्थिक विकास की दुहाई दी जाती है। इसका विकल्प है कि हम उत्तराखण्ड में सेवा क्षेत्र को बढ़ावा दे। नैनीताल के पास भवाली में क्षय रोग के मरीजों के लिए सैनिटोरियम दशकों पहले बनाया गया था । इसके पीछे विचार था कि वहां की शुद्ध और खुली हवा से मरीजों को स्वास्थ्य लाभ शीघ्र होगा। इसी प्रकार हम गंगा के किनारे साफ्टवेयर पार्क, यूनिवर्सिटी, अस्पताल, कंप्यूटर सेंटर इत्यादि स्थापित करें। तब पर्यावरण पर भार भी कम होगा, अर्थिक विकास अधिक होगा और उच्च वेतन वाले रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे ं। हैरानी है कि सेवा क्षेत्र पर ध्यान देने के स्थान पर सरकार जल विद्युत बढ़ाने पर क्यों संकल्पित है? इसका कारण राजनीतिक लाभ ही दिखाता है। जैसे भोजन में पिज्जा अच्छा भले ही लगता हो, लेकिन सेहत के लिए दाल-रोटी ही भली होती है । वर्तमान आपदा एक चेतावनी भर है । यदि हम हिमालय के धसकने वाले मूल चरित्र पर ध्यान नहीं देंगें तो इस प्रकार की घटनाएं होती रहेंगी।
आश्चर्य है कि प्रकृति का गुणगान करने वाली भारतीय संस्कृति गंगा जैसी पवित्र नदी के मुक्त बहाव को बाधित कर रही और भोगवदी कहलाने वानी अमेरिकी संस्कृति ने ‘बाइल्ड एंड सीनिक एक्ट’ बनाया है। इस कानून के तहत नदियों के विशेष हिस्से को ‘बाइल्ड एंड सीनिक’ घोषित कर दिया जाता है। इसके बाद उन हिस्सों में पशु चराने की भी अनुमति नहीं होती। उन्हें बिल्कुल नैसर्गिक रूप में रखा जाता है। अमेरिका में कई जल विद्युत परियोजनाएं सिर्फ इसलिए बंद की गई क्योंकि वहां के लोग बहती नदी में नहाने, नौका चलाने और मछली पकड़ने का आनंद लेना चाहते थें। हमें प्रकृति की केवल प्रशंसा कने के स्थान पर उसे वास्तविक रूप से साकार करना चाहिए । आर्थिक विकास का प्रकृति के साथ संतुलन बनाना चाहिए । चमोली की आपदा हमारे लिए खतरे की घंटी है। इसका संज्ञान लेकर हमें देश की सभी नदियों के मुक्त बहाव को सुनिश्चित करने और उनकी पारिस्थितिकी बचाने के उपाय करने होंगे । हमें ‘पृथ्वी शांति रापः शांति रोपधयः शांति वनस्पतयः शांति’ के मंत्र को ईमानदारी से लागू करना होगा।

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