महीपाल सिंह नेगी/

50 साल पहले उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा घाटी में बिरही गंगा पर बना ताल टूट गया था। तब 70 लोग बह गए थे। खेत, खलिहान बहे। गाड़ियां बही और पशु धन की भी बड़ी क्षति हुई। बात 20 जुलाई 1970 की है। कहां और कैसे टूटा ताल, जानिए

और पीछे ले चलते हैं आपको। बात आज से 127 साल पुरानी है। 1893 की बात। अंग्रेजों का राज था। अलकनंदा नदी की सहायक नदी है, बिरही गंगा। गौना गांव के निकट पहाड़ी टूटी और बिरही गंगा का प्रवाह अवरुद्ध हो गया। बड़ी भारी झील बन गई। चमोली, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, गोचर, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर से लेकर देवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार तक सनसनी फैल गई।

अभी बरसात का मौसम था। बिरही नदी पर झील बन गई, यह बात अंग्रेज सरकार तक पहुंची। पता लगाया गया कि बिरही नदी है कहां, और कहां बनी झील। सर्वेक्षण हुआ और जगह चिन्हित हुई। इससे पहले कि किसी दुर्घटना का इंतजार होता, अंग्रेज सरकार ने झील के दूसरे छोर पर बसे दुर्मी गांव में कर्मचारी तैनात कर दिया और कुछ ही महीनों में दुर्मी गांव में तार घर भी खोल दिया।

प्रतिदिन ताल के जलस्तर की माप की जाने लगी सूचना नीचे के गांवों तक भेज दी जाती। इससे पहले वहां कोई तार घर नहीं था। पौड़ी से डेढ़ सौ किलोमीटर लंबी लाइन बिछाई गई, दुर्मी गांव तक। तब सड़क नहीं थी, गाड़ियां भी नहीं थी। यह सब काम पैदल हुआ।

अब इस प्रबंधन का प्रभाव देखिए कि एक साल बाद ही 1894 में बरसात के दौरान झील टूटने लगी बिरही और अलकनंदा घाटी में बाढ़ आ गई। लेकिन सही वक्त पर दुर्मी के तार घर से सूचना भेज दी गई थी। घाटी के गांवों को सतर्क किया गया। परिणाम यह हुआ कि खेत, खलिहान, फसल और घर तो बह गए लेकिन जनहानि केवल एक की हुई। कहा यह भी गया कि एक सन्यासी ने जल समाधि ले ली थी।

जब तक अंग्रेजी शासन रहा, दूर्मी गांव में तार घर काम करता रहा। क्योंकि झील कुछ टूटने पर भी खतरनाक बनी हुई थी। इस एक ताल को कहीं गौना, कहीं दुर्मी तो कहीं बिरही ताल कहा गया है। गौना और दुर्मी दो छोरों पर बसे दो गांव हैं।

फिर 1947 में आजादी आ गई। दुर्मी का तार घर और पुराना सूचना तंत्र, कब बिखर गया पता ही नहीं चला। सब निश्चिंत हो गए कि शायद अब ताल नहीं टूटेगा। 20 जुलाई 1970 को गौना ताल टूट गया। भयंकर बाढ़ आई। बेलाकूची गांव पूरी तरह से बह गया। इस कारण इसे बेलकूची की बाढ भी कहा गया। अब तक सड़कें बन गई थी, टेलीफोन लाइनें भी बिछ गई थी और मोटर गाड़ियां भी दौड़ने लगी थी। लेकिन आपदा का पुराना प्रबंधन तंत्र गायब था। 70 लोग बहे। जनधन की व्यापक हानि हुई। गाड़ियां भी बही।

1894 में बिरही नदी में बने इस ताल के टूटने पर गीत बने थे। 1970 की बिरही की बाढ़ से मात्र 5 साल पहले नयार नदी में भीषण बाढ़ आई थी और सतपुली में 27 गाड़ियों सहित अनेक लोग बह गए थे। तब भी सबक नहीं सीखा गया।

कुछ ही साल बाद 1978 में उत्तरकाशी में भागीरथी नदी पर डबराणी में पहाड़ टूटा और झील बन गई। और फिर वो टूट भी गई। पूरा उत्तरकाशी शहर खाली हो गया। लोग पहाड़ों पर चले गए। खेती, मकान, सड़कें, पशु बह गए। दिन की बात थी, जनहानि ज्यादा नहीं हुई। लोक कवि घनश्याम सैलानी ने इस पर एक लंबा गीत लिखा था। इस गीत का उल्लेख अगली किसी रिपोर्ट में करूंगा
बिरही नदी पर बने ताल के विस्तार का उल्लेख एच जी वॉल्टन के “गढ़वाल हिमालय गजेटियर” में भी है। वॉल्टन लिखते हैं, 1894 में ताल के कुछ टूटने के बाद भी, यह ताल करीब 2 मील लंबा और आधा मील चौड़ा है। ताल का क्षेत्रफल 400 एकड़ है, जो नैनीताल से 3 गुना बड़ा है। वाल्टन का गजेटियर 1910 में प्रकाशित हुआ।

स्मरण रहे, बिरही गंगा भी उसी त्रिशूली पर्वत श्रृंखला से निकलती है, जिससे निकलने वाली ऋषि गंगा में कल ही भारी बाढ़ से तबाही हुई है। संवेदनशील कैचमेंट क्षेत्र है। क्या बिरही गंगा पर भी कोई बांध बनने वाला होगा ?

 

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