उत्तराखंड के नगर निगमों में मेयर और उप मेयर के खर्च को लेकर स्पष्ट नियमों का अभाव सामने आया है। सरकारी वाहनों के उपयोग, ईंधन खर्च और अन्य सुविधाओं की कोई निर्धारित सीमा तय नहीं होने से निगमों में खर्च की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। इस मुद्दे पर दायर एक आरटीआई के बाद मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचा, जहां से भी स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए गए, लेकिन अब तक ठोस निर्णय नहीं हो पाया है।
मामला तब सामने आया जब रुड़की के गीतांजलि विहार निवासी अमित अग्रवाल ने फरवरी 2023 में नगर निगम रुड़की से मेयर के खर्च की सीमा से जुड़ी जानकारी मांगी। नगर निगम और शासनादेशों की जांच के बावजूद खर्च की कोई स्पष्ट सीमा निर्धारित नहीं मिली। इसके बाद अपीलकर्ता ने मामला सूचना आयोग, देहरादून में उठाया।
14 नवंबर 2023 को राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट ने शहरी विकास विभाग को निर्देश दिए कि मेयर और उप मेयर के भत्तों व सुविधाओं के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। इसके तहत शहरी विकास निदेशालय ने प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा, लेकिन तीन साल बीतने के बाद भी इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। फरवरी 2026 में अपर सचिव द्वारा भेजे गए जवाब में कहा गया है कि प्रस्ताव पर कार्यवाही “गतिमान” है।
आयोग ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे गंभीर विषय बताया है। आयोग के अनुसार, राज्य गठन के 25 साल बाद भी नगर निगमों में उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम 1959 के तहत व्यवस्था चल रही है, जिसमें मेयर के खर्च को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। लगातार बढ़ते नगर निगमों के बीच यह स्थिति असमंजस पैदा कर रही है।
सूचना में यह भी सामने आया है कि वर्ष 2022-23 के दौरान 15 महीनों में वाहन के ईंधन, मरम्मत और कर्मचारियों के वेतन पर करीब 25 लाख रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद खर्च की कोई तय सीमा न होना वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
