नई दिल्ली। चुनावी प्रक्रिया में कथित धांधली और फर्जी मतदान पर रोक लगाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है। याचिका में आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आइरिस आधारित बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू करने की मांग की गई है, ताकि केवल वास्तविक मतदाता ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।
यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई है। याचिका में दोहरी वोटिंग, पहचान बदलकर वोट डालने और फर्जी मतदाताओं द्वारा मतदान जैसे मामलों पर गंभीर चिंता जताई गई है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह चुनाव आयोग को निर्देश दे कि आगामी विधानसभा चुनावों में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण अनिवार्य किया जाए।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान मतदाता पहचान प्रणाली, जो मुख्य रूप से मतदाता पहचान पत्र और मैन्युअल सत्यापन पर आधारित है, कई कमियों से ग्रस्त है। पुरानी तस्वीरें, लिपिकीय त्रुटियां और वास्तविक समय में सत्यापन की कमी के कारण पहचान छिपाकर वोट डालने और एक से अधिक बार मतदान की आशंका बनी रहती है। ऐसे में बायोमेट्रिक तकनीक इन खामियों को दूर कर सकती है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि फिंगरप्रिंट और आइरिस आधारित पहचान अद्वितीय होती है, जिसे डुप्लिकेट करना लगभग असंभव है। इससे “एक नागरिक, एक वोट” के सिद्धांत को सख्ती से लागू किया जा सकेगा। साथ ही यह प्रणाली प्रवासी मतदाताओं, डुप्लिकेट चुनावी प्रविष्टियों और फर्जी मतदाताओं की समस्या के समाधान में भी सहायक साबित हो सकती है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक तकनीकी उपाय लागू करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है। बायोमेट्रिक सत्यापन से चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और रियल टाइम ऑडिट ट्रेल सुनिश्चित होने की उम्मीद जताई गई है।
