शंखनाद INDIA-: अब लोग भारत चीन सीमा से पलायन न करें तो और क्या करें! नन्दप्रयाग-घाट मोटरमार्ग जो भारत चीन सीमा के एकदम नजदीक है और 1971 में इस रास्ते अनेक तिब्बती भाग कर भारत में शरण लेने आये थे जिन्हें मैंने न केवल अपनी आंखों से देखा बल्कि इन्हें अपने आँगन में शरण भी दी। जबकि इनके चँवरगाय और बकरियों की खालों से बने लिवास से असह्य बदबू आ रही थी। तबसे 50 साल होगये और 1960 में इस सड़क की कटिंग हो गयी थी। 60 साल में यह सड़क एक इंच भी चौड़ी नहीं हुई जबकि तब इस सड़क पर एक GMO की बस सुबह और एक शाम चलती थी। दिन में दो एम्बेसडर चलती थी एक गण्डासु के विद्यादत्त पुरोहित औऱ दूसरी जोंका पाणी के देवी प्रसाद पुरोहित की थी।

हम TATA 1210 D मॉडल बस के पीछे सीढ़ियों पर औऱ छत पर ही मुश्किल से जगह पाते थे। गाड़ी में अपर और लोअर क्लास की सीटें होती थी। अपर क्लास ड्राइवर के बगल पर और उसके एक सीट पीछे की लाइन होती थी। यहां साहब लोग या सेठ लोग बैठते थे क्योंकि इसका किराया लोअर क्लास से दूना था। इसलिए हम कभी इस सीट पर बैठने की सोच भी नहीं सकते थे।ड्राईवर साहब की बड़ी इज्जत होती थी। जान सुरक्षित रहे इसलिए सब उनकी दाद देते साहब लोग भी उनकी हाँ में हाँ मिलाते थे।

तब मेरे गाँव में मुख्य तीन परिवार थे। आज उस दौर के लोग गुजरते जा रहे हैं लगातार पलायन के बावजूद गाँव में तीन के पन्द्रह और पन्द्रह के तीस परिवार हो गए हैं। हर घर औऱ गाँव में गाड़ी है तब की 19 किलोमीटर लिंकरोड जो आज मुख्य रोड बन गयी है उस पर लगभग 12 लिंक रोड़ें जुड़ गई हैं जिनकी कुल लम्बाई 300 किलोमीटर से अधिक है। तारीफ की बात है कि जो लिंक रोड वर्तमान में बन कर जुड़ रही हैं उनकी चौड़ाई वर्तमान नन्दप्रयाग घाट रोड से दूनी है।

इस रोड पर आज दबाव का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि हर मिनट में एक वाहन गुजरता है। अगर दो बड़े वाहनों का आमना-सामना हो गया तो वे क्रॉस नहीं हो सकते आपको सौ-पचास मीटर की दूरी तक वाहन को आगे-पीछे करना पड़ता है तब जाकर आप वाहन निकाल सकते हैं। लेकिन आर्मी का ट्रक लग गया तो समझो जान आफत में वो अनाड़ी तो गाड़ी पीछे करते ही नहीं हैं। इस बीच वाहनों की लम्बी लाइन और जाम की समस्या एक किलोमीटर की दूरी पार करने में एक घण्टा लगा देती है।

सड़क के डामरीकरण का भगवान मालिक है। यह सड़क अधिकतर सूर्य के विपरीत दिशा की ओर है जिस कारण सड़क का अधिकांश हिस्सा पहाड़ों से रिसते पानी की जद में है जिसमें सरकारी डामर असरकारी नहीं बन पाता।ऐसी स्थिति में यह सड़क बहुत बुरे हाल में है 1974 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहुगुणा ने सुप्रसिद्ध कथा वाचक और सामाजिक कार्यकर्ता ढुङ्गल्वाली के पंडित मनसाराम शास्त्री के अनुरोध पर इस मोटरमार्ग के खतरनाक स्थानों को चौड़ा करने और सड़क के डामरीकरण के लिए लखनऊ से धनराशि जारी की लेकिन पोखरी से तत्कालीन MLA नरेंद्र सिंह भंडारी ने उस धनराशि को अपने प्रभाव से गोपेश्वर पोखरी रोड के निर्माण में लगा दिया।
क्योंकि घाट क्षेत्र नेतृत्व विहीन रहा इसलिए इस क्षेत्र का कभी पूछने वाला कोई नहीं रहा। मई-जून में वर्षात से बंद रोड सितम्बर-अक्टूबर में जाकर खुलती थी। मैंने नन्दप्रयाग से घोड़ों में राशन घाट आते देखा है।

इस रोड के बनने के बाद नन्दप्रयाग- घाट पैदल मार्ग विलुप्त हो गया और यही मुख्य व एकमात्र सम्पर्क मार्ग बन गया लेकिन लम्बे समय तक बन्द रहने के कारण इस क्षेत्र के छोटे व विपिन्न किसान राजमा, आलू, चौलाई, सॉफ्ट स्टोन और पठाल (मकान के छत की स्लेटें) आदि का कारोबार नहीं कर पाये अर्थव्यवस्था ठप पड़ गयी तब इस स्थिति में अगर थोड़ा बहुत परिवर्तन आया तो इसका श्रेय कॉमरेड सुदर्शन सिंह कठैत को जाता है। 1975-76 में आपातकाल के हालातों में भी इन्होंने वर्षात से बंद सड़क को खोलने के लिए आंदोलन किया। यह वह दौर था जब घाट बाजार में पहली बार लाउडस्पीकर पर भाषण हुआ।

मुझे इसलिए याद है कि तब एम्प्लीफायर पर माउथ पीस की लीड लगाने पर ही दो घण्टा लग गया था किसी को यह सही ढंग से कैसे लगता है पता नहीं था। उसके बाद अपवाद को छोड़कर यह सड़क कभी ज्यादा दिनों के लिए बन्द नहीं हुई। लेकिन शायद यह उत्तराखण्ड की सबसे बर्बाद सड़क है जिसका पूछने वाला कोई नहीं है। जबसे घाट विकास खण्ड को थराली विधानसभा क्षेत्र में मिलाया गया तबसे इस क्षेत्र का दुर्भाग्य और भी गहरा गया है।

जब 12 साल में नन्दादेवी राजज़ात यात्रा निकलती तब इस सड़क पर माननीयों के आगमन के लिए टल्लीयां लगाई जाती हैं। लेकिन अब तो यह नौटंकी भी बंद कर दी गयी है क्योंकि माननीयों ने कुरूड़, वैरासकुण्ड और रामणी में अपने खटोले के उतरने के लिए अस्थाई हेलीपैडों का निर्माण किया है इसलिए अधिकारियों को सड़कों को ठीक करने की जरूरत नहीं। नतीजतन गाड़ी का जो टायर तीन साल चलना है वो तीन महीने भी चल जाए तो गनीमत है। सड़क पर नई गाड़ी भी तीन महीने में पुरानी और जर्जर होकर चों-चों करने लगती है। जबकि ड्राइवर और वाहन स्वामी रोड टैक्स पूरा ही दे रहे हैं। पर उनके लिए भी यह घाटे का सौदा नहीं है। कारण है कि इस रोड पर 19 किलोमीटर का किराया 100 रुपया है जो कि देश के सेंसेक्स की तरह कुलाँचे भरता रहता है।

जबकि यहां आविर्भूत करने वाले सौंदर्य स्थल हैं जिनके सम्मोहन से यूरोप घूम कर आये अंग्रेज यात्री नहीं बच पाये तो औरों की क्या बात! बंगाली गाँव का नयनाभिराम अपलक निहारने को मजबूर कर देता है। सुखताल-झलताल तो अंग्रेज शासकों का पसंदीदा पिकनिक स्पॉट रहा है उन्होंने इन झीलों में विभिन्न प्रकार की मछलियां डाली और बोटिंग का आनन्द लिया। अंग्रेजों के अवसान के साथ इन पर्यटक स्थलों के दिन भी अस्त हो गये।

यह क्षेत्र अपने दिव्य तीर्थ स्थलों के लिए जाना जाता है। रावण की तपःस्थली-वैरासकुण्ड जहाँ रावण ने अपने 9 सिरों की आहुति दी।
श्रीविद्या के लिए धरती की सबसे बड़ी साधना स्थली जहां नन्दात्मजा नन्दा कंस के हाथों छूट कर हिमालय में अवस्थित हुई और शक्ति के साधकों ने यहाँ पर बीजमंत्रों की कुल्लिका प्राप्त की जिससे इस स्थान का नाम कुलूड़ हुआ। यह दिव्य स्थल भी यहीं है।
यहाँ पर मोलिंग पर्वत शिखर है। जो धरती का एकमात्र स्थान है जहां शक्ति के साधकों ने आकाश लिंगी रूप में देवी की साधना की।
इतवार गिरी महाराज ने इसी स्थान पर देवी को सिद्ध किया। वे नौ कन्याओं की समग्र नग्न अवस्था में पूर्ण विधि विधान से पूजा करते थे। यह कम कठिन काम नहीं था।

स्थानीय लोग महाराज को भगवान मानते थे इन्हीं इतवार गिरी महाराज के नन्दप्रयाग के सेठ गोकुलदेव और अमरदेव शिष्य थे जिनके सन्तान नहीं हो रही थी। महाराज ने अपने इन शिष्यों की मनोकामना पूर्ति के लिए अनसूया में मन्दिर का पुनर्निर्माण और वर्तमान मन्दिर की स्थापना करवाई। तब जाकर विख्यात स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी अनसूया प्रसाद बहुगुणा का जन्म हुआ।हम 1992 में इस दिव्य मोलिंग शिखर पर गये वहां पर अब भी वही शिवलिंग है। जिसपर स्थानीय छप्परों वाले पशु चारक गाय का दूध चढा कर पूजा करते हैं लेकिन उस शिवलिंग की हालत देख कर रोना आया।

सड़े दूध में पड़े कीड़े स्थिति को वीभत्स कर रहे थे। दो घण्टे सफाई में लगाये पर वहां आस-पास कहीं पानी नहीं है। जबकि यह ब्रह्म यजन गिरी पर्वत की एक शाखा के रूप में पुराणों में वर्णित है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि ब्रह्मा का मूल मन्दिर पुष्कर में नहीं बल्कि इसी पर्वत श्रृंखला से आगे बढ़कर भेटी बुग्याल के पूर्व में है। यहाँ की दिव्यता देखते ही बनती है लेकिन दुर्भाग्य देखिये यह स्थल उत्तराखण्ड सरकार के तीर्थ मन्दिरों या पर्यटन की सूची में नहीं है जबकि इसके बेस कैंप ( भेटी गाँव के ऊपर) जितने चौड़े खेत हैं उनकी शोभा देखते ही बनती है। हमने जितना इसे देखा है यह औली और मनाली से सैकड़ों गुना सुन्दर स्कीइंग ट्रैक की क्षमता लिए है। यूरोप का कोई भी ट्रैक इसके आगे कहीं नहीं टिकता।

यहीं से भारत की सबसे ऊंचे पवित्र पर्वत शिखर नन्दादेवी और उसकी शाखाओं- त्रिशूली व नन्दा घुँघुटी के बेस कैंप का रास्ता जाता है जिनके दर्रों से तिब्बती लुटेरे भारत में लूट के लिए आते रहे हैं जिनका वर्णन इतिहास की किताबों में भरा पड़ा है।
वर्ष 2000 में जब इस सीमा की सुरक्षा पर मैंने अपने लेखों से सवाल उठाया तो भारतीय सेना ने तत्काल एक्शन लिया और सुतोल से आगे तातड़ा में अपना बेस कैम्प बनाया।

पवित्र रूपकुण्ड, शिला समुद्र होमकुण्ड जैसे तीर्थों का मार्ग भी यहीं से प्रशस्त होता है।यही पर्वत श्रृंखला आगे उत्तर की ओर मुड़कर देवांगन सप्तकुण्ड की ओर चली जाती है। यही ब्रह्म यजनगिरी का केंद्र बिन्दु है जहां प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ से सप्त ऋषियों (मनुष्यमात्र के पूर्वज गोत्र ऋषि) को प्रकट किया था। लेकिन कलियुग का प्रभाव देखिए कि आज लोगों को इस बात का पता तक नहीं है जबकि सारे पौराणिक ग्रन्थ इस सत्य का बखान करते हैं। आज सेक्युलर देश में इन बातों की जरूरत किसे है?

सत्य बोलने वाले बहुधा बेबकूफ़ और मूर्ख समझे जाते हैं। इस दंश को हमसे भला और कौन समझ सकता है? रामणी से दो दिन के चढाई भरे रास्ते को चढ़कर नन्दादेवी राज जात में देवांगन सप्तकुण्ड पहुंचते हैं। देवी-देवता तो अपने पितरों के प्रति युगों-युगों से अपना फर्ज अदा करते चले आ रहे हैं लेकिन आदमियों को कब समझ आयेगी? या फिर आयेगी भी या नहीं यह सोचने की बात है।
यह देश दुनिया के मानव विज्ञानियों के लिए शोध का सबसे बड़ा और मूल केंद्र है, लेकिन किससे कहें?

सोचिए अगर हम पौराणिक ग्रन्थों के संदर्भ से ही इस प्रस्थापना से विश्व को अवगत करवायें तो यहाँ शोध अध्येताओं, नृ-विज्ञानियों, पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों का वॉल्यूम क्या होगा?………
अंग्रेज शासक भारतीयों की तरह अति सेक्युलर नहीं थे इसलिए वे इन तथ्यों के प्रति आस्थावान थे।
भेटी के बुग्याल से ब्रह्मा जी के मंदिर तक जाने का रास्ता अंग्रेजों का बनाया आज तक अवशेषों के रूप में सुरक्षित है। जबकि लार्ड कर्जन रोड़ इस पूरे इलाके को छूकर निकलती है। इस सारी मानव जाति की विरासत को जोड़ना लार्ड कर्जन की रणनीति का हिस्सा था वह भारत और चीन जैसे बड़े बाजारों से इस विश्व विरासत को जोड़ कर उन्नति के शिखर पर पहुँचाना चाहता था।

लेकिन शायद हमारी किस्मत ही खराब रही होगी। तब तक देश की बागडोर उन कर्णधारों के हाथ में आ गयी जिनसे चलने के लिए सड़क तक की मांग करनी पड़ रही है और अब वह भी नहीं सुनी जा रही।

बाकी विकास का अंदाजा आप खुद लगा लें!
——-डॉ0 भगवती प्रसाद पुरोहित

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