देवभूमि उत्तराखंड, जो अब तक अपनी शुद्ध आबोहवा और प्राकृतिक जलस्रोतों के लिए जानी जाती थी, अब पानी के बढ़ते प्रदूषण से जूझ रही है। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि प्रदेश के पहाड़ी जिलों में भूजल महानगरों की तरह प्रदूषित हो रहा है। चमोली को छोड़कर सभी आठ पर्वतीय जिलों में आयरन (लौह तत्व) की मात्रा तय मानकों से कहीं अधिक पाई गई है।

यूपीसीबी ने प्रदेश के 13 जिलों में भूजल की गुणवत्ता की जांच 32 मानकों पर की, जिसमें भौतिक, रासायनिक, जैविक तत्वों और भारी धातुओं की जांच शामिल थी। रिपोर्ट के अनुसार, ऊधमसिंह नगर का आईजीएल लगून (चामालिडा) क्षेत्र सबसे अधिक प्रदूषित पाया गया, जहां आयरन की मात्रा 0.93 माइक्रोग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई।

देहरादून के सेलाकुई और हरिद्वार के भगवानपुर में यह स्तर 0.90 माइक्रोग्राम प्रति लीटर रहा, जबकि उत्तरकाशी शहर में 0.79 माइक्रोग्राम प्रति लीटर आयरन पाया गया। इसके विपरीत, चमोली जिले के गोपेश्वर क्षेत्र में सबसे शुद्ध पानी मिला, जहां आयरन की मात्रा मात्र 0.13 माइक्रोग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई।

यूपीसीबी के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते के अनुसार, वर्ष 2021 के बाद से पहाड़ी जिलों के भूजल में आयरन की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसका प्रमुख कारण सॉलिड वेस्ट से उत्पन्न प्रदूषण माना जा रहा है। बोर्ड द्वारा लगातार पानी की निगरानी और सैंपलिंग की जा रही है, ताकि आम लोगों को दूषित पानी के सेवन से बचाया जा सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक आयरन युक्त पानी का सेवन किडनी, लिवर और पेट संबंधी बीमारियों का कारण बन सकता है। त्वचा में खुजली, सूखापन, पेट में संक्रमण, ऐंठन और कब्ज की समस्या भी हो सकती है।

इसके अलावा शरीर में जिंक और कैल्शियम के अवशोषण की क्षमता भी प्रभावित होती है। रिपोर्ट ने राज्य में जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन की गंभीर आवश्यकता को एक बार फिर उजागर किया है।