उत्तराखंड की महत्वाकांक्षी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना अब इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नए मानक स्थापित कर रही है। दुर्गम हिमालयी पहाड़ियों के नीचे बन रही यह रेल लाइन न केवल कनेक्टिविटी को मजबूत करेगी, बल्कि अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग के कारण वैश्विक स्तर पर भी चर्चा में है। इस परियोजना के तहत ब्यासी-देवप्रयाग सेक्शन में देश का पहला ‘फ्लोटिंग रेल टनल जंक्शन’ तैयार किया जा रहा है।

परियोजना के उप महाप्रबंधक (डीजीएम) और सिविल इंजीनियरिंग विशेषज्ञ ओमप्रकाश मालगुड़ी के अनुसार, आमतौर पर रेलवे टनल जंक्शन मजबूत चट्टानों पर बनाए जाते हैं, लेकिन इस रूट पर मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) का ऐसा जोन मिला है जहां जमीन बेहद कमजोर और चूरे जैसी है। ऐसे चुनौतीपूर्ण हालात में ‘डबल-आर्क सिस्मिक आइसोलेशन’ तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो भारत में पहली बार लागू हो रही है। यह तकनीक टनल को लचीला बनाती है, जिससे वह ‘फ्लोटिंग’ यानी तैरती संरचना की तरह व्यवहार करती है और भूकंपीय जोखिम को कम करती है।

इस टनल की सबसे बड़ी खासियत इसकी भूकंप-रोधी डिजाइन है। भूकंप के दौरान सुरंग शॉक एब्जॉर्बर की तरह काम करेगी—हल्की सी खिसककर फिर अपनी जगह पर लौट आएगी, जिससे संरचना को नुकसान की संभावना बेहद कम हो जाएगी।

सुरक्षा के लिहाज से इसमें अत्याधुनिक रॉक मॉनिटरिंग सिस्टम लगाया जा रहा है। टनल की दीवार में यदि 1 मिलीमीटर का भी बदलाव होता है, तो ऋषिकेश स्थित कंट्रोल रूम में तुरंत अलार्म बज जाएगा। इसके अलावा, तेज रफ्तार ट्रेनों से उत्पन्न वायु दबाव को नियंत्रित करने के लिए एयर कुशन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जिससे यात्रियों को असहजता नहीं होगी।

करीब 125 किलोमीटर लंबी यह परियोजना चारधाम यात्रा और पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए गेमचेंजर साबित होगी। इससे यात्रा समय घटेगा, पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा और आपदा के समय राहत एवं बचाव कार्य भी तेज हो सकेंगे।