देहरादून। आज पूरा देश 77वां गणतंत्र दिवस हर्षोल्लास के साथ मना रहा है। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिलने के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी देश के संचालन के लिए एक लिखित संविधान का निर्माण। इसी आवश्यकता से जन्म हुआ दुनिया के सबसे बड़े लिखित संविधान का, जिसे 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने स्वीकार किया और 26 जनवरी 1950 को देश में लागू किया गया।
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय संविधान की पहली प्रतियां उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित सर्वे ऑफ इंडिया में छापी गई थीं। यही कारण है कि देहरादून का नाम केवल प्राकृतिक सौंदर्य और सैन्य संस्थानों के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के ऐतिहासिक निर्माण से भी जुड़ा हुआ है।
आजादी के बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में गठित ड्राफ्टिंग कमेटी ने संविधान का प्रारूप तैयार किया। इसके बाद इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ की छपाई का दायित्व सर्वे ऑफ इंडिया को सौंपा गया, जिसने लगभग पांच वर्षों में इस कार्य को पूर्ण किया। संविधान की पहली 1000 प्रतियां यहीं मुद्रित की गई थीं, जिनमें से कुछ आज भी सुरक्षित हैं।
भारतीय संविधान की पहली मूल प्रति टाइप नहीं की गई थी, बल्कि इसे प्रसिद्ध कैलिग्राफर प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने हाथों से इटैलिक शैली में सुंदर सुलेख में लिखा था। इसके प्रत्येक पृष्ठ को शांति निकेतन के कलाकारों ने कलात्मक चित्रों से सजाया, जिनमें मोहनजोदड़ो से लेकर सिंधु घाटी सभ्यता तक की झलक दिखाई देती है। सुलेख में स्वर्ण पत्ती और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया गया था।
सर्वे ऑफ इंडिया के पास आज भी वे ऐतिहासिक मशीनें सुरक्षित हैं, जिनसे संविधान की पहली छपाई हुई थी। संविधान की एक मूल प्रति संसद पुस्तकालय में और दूसरी देहरादून में संरक्षित है।
भारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि देश की आत्मा है और इसकी पहली सांसें देहरादून की धरती पर ही ली गई थीं।
