शंखनाद INDIA/
उत्तराखण्ड के चमोली में तबाही का सबक बनी ऋषिगंगा नदी में विज्ञानियों को एक और झील दिखी हैं। निसंदेह इस नई जानकारी ने वहां के ग्रामीणों के साथ ही सरकार की भी चिंता बढ़ा दी है। अब शासन स्तर पर झील की सतत निगरानी के लिए कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन लगातार आ रहा बदलाव, यह बताने के लिए काफी है, कि खतरा टला नहीं है। जरूरत इस बात की हैं पूरे क्षेत्र का गहनता से सर्वेक्षण कर वास्तविक स्थिति का पता लगाया जाए। उत्तराखंड लगाया जाए। उत्तराखंड व इससे लगे हिमालयी इलाके में ग्लेशियरों की संख्या नौ हजार के आसपास है। इनमें छोटे और बड़े दोनों तरह के ग्लेशियर शामिल है। ग्लेशियर पिघलने से झीलों का बनना प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन अभी विज्ञानियों को यह नहीं पता कि क्षेत्र में ऐसी कितनी झीलें हैं।

दरअसल, विज्ञानियों को इन को इन ग्लेशियर के बारे मे जानकारी बहेद कम है। वर्ष 2013 में आई केदानाथ आपदा का कारण भी चैराबाड़ी झील बनी थी, जो कि केदारनाथ धाम के ठीक ऊपर स्थित थी। हैरत यह हैं कि इन नौ ग्लेशियर में से अध्ययन सिर्फ छह का ही किया जा रहा हैं। इनमें उत्तराखण्ड के पांच व लद्दाख ग्लेशियर शामिल है। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ग्लेशियर का अध्ययन कर रहा हैं। लेकिन विडंबना यह है कि कोरोना काल में सेंटर फाॅर ग्लेशियोलाॅजी प्रोजेक्ट के तहत ग्लेशियरों का अध्ययन और निगरानी की जानी थी, उसे बंद कर दिया गया।

अब नए परिदृश्य मे एक बार फिर इसकी जरूरत हमसूस की जा रही है। इसमे कोई दो राय नहीं है कि प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से उत्तराखण्ड सर्वाधिक संवेदनशील प्रदेशों मे शुमार है। बात चाहे भूकंप की हो या सैलाब की, मौसम मानसून का हो अथवा सर्दियों का, कभी भी कुछ भी हो सकता हैं। ऐसे में  विज्ञानिकों को न केवल गहन अध्ययन की जरूरत है, बल्कि प्रकृति में होने वाले बादलावों पर भी निंरतर नजर रखनी होगी। विज्ञानियों को इसका एहसास भी है। वे स्वीकार करते है। कि अध्ययन का दायरा काफी सीमित है। किसी घटना के बाद उसका विश्लेषण भले ही किया जाता हो, लेकिन खतरे का पूर्वानुमान लगाना हमेंशा बड़ी चुनौती रहा है । जाहिर है ग्लेशियर पर जितना अधिक अध्ययन किया जाएगा, उससे आपदा प्रब्रधन को तो मजबूरी मिलेगी ही पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेंगी।

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