चमोली। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर और हिमखंड से जुड़े संभावित खतरों की निगरानी के लिए वैज्ञानिक प्रयास तेज कर दिए गए हैं। इसी कड़ी में चमोली जिले की नीती घाटी के ग्लेशियर और हिमखंड प्रभावित क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने के लिए वैज्ञानिकों की टीम रवाना हो गई है। टीम को इनर लाइन की अनुमति मिलने के बाद सीमांत क्षेत्र के लिए भेजा गया है।

अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर और हिमखंड से जुड़े खतरों को लेकर सतर्कता बढ़ाई गई है। इसी को ध्यान में रखते हुए दुर्घटना संभावित क्षेत्रों को चिह्नित कर वहां आधुनिक निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। नीती घाटी में भी इसी योजना के तहत अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे संभावित खतरे की समय रहते जानकारी मिल सके।

ज्योतिर्मठ के उपजिलाधिकारी चंद्रशेखर वशिष्ठ ने बताया कि वैज्ञानिक दल नीती घाटी में सिस्टम स्थापित करेगा। अभियान में वैज्ञानिकों के साथ विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल हैं। दुर्गम और ऊंचाई वाले क्षेत्र में उपकरणों की स्थापना के लिए टीम को स्थानीय परिस्थितियों और मौसम की चुनौतियों का भी सामना करना होगा।

इससे पहले चमोली जिले की वसुंधरा हिमनद झील में भी अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की पहल शुरू की गई है। राज्य में ग्लेशियल झीलों से संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) के खतरे को देखते हुए निगरानी व्यवस्था मजबूत की जा रही है। वसुंधरा ताल में लगाए जाने वाले सिस्टम में अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और रियल टाइम आंकड़ों की निगरानी की व्यवस्था होगी।

उत्तराखंड में 13 संवेदनशील हिमनद झीलों की पहचान की गई है। चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ की ऐसी छह झीलों का अध्ययन भी किया जा चुका है। विशेषज्ञ इन झीलों के क्षेत्रफल, आसपास की भौगोलिक स्थिति और अन्य जोखिमों का अध्ययन कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित होने से ग्लेशियर या हिमनद झील से अचानक खतरा उत्पन्न होने की स्थिति में समय रहते संबंधित विभागों और संभावित प्रभावित आबादी को चेतावनी देने में मदद मिलेगी।