उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा का खतरा केवल अतिवृष्टि या बादल फटने तक सीमित नहीं है, बल्कि लगातार हल्की बारिश भी धराली जैसी बड़ी तबाही का कारण बन सकती है। दून विश्वविद्यालय और देश के छह प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों के विशेषज्ञों द्वारा किए गए संयुक्त अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है कि पहाड़ों पर जमा मलबा मामूली बारिश में भी खतरनाक साबित हो सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में 15 से 30 दिनों तक रोजाना छह से सात मिलीमीटर बारिश होती है, तो मलबे के ढेर पानी सोखकर अस्थिर हो जाते हैं। ऐसे में मलबा लगभग 10 किलोमीटर प्रति सेकेंड की गति से खिसक सकता है, जिससे निचले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
उत्तरकाशी का धराली क्षेत्र इसका ताजा उदाहरण है। पांच अगस्त को आई आपदा एक-दो दिन की बारिश का परिणाम नहीं थी, बल्कि पूरे एक महीने की लगातार वर्षा का नतीजा थी। पांच जुलाई से पांच अगस्त तक धराली में 195 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। दून विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. विपिन कुमार के अनुसार, बारिश के बाद मलबे ने 60 किलोपास्कल का दबाव बनाकर खीरगंगा नदी के बहाव के साथ तेजी से नीचे आकर भारी तबाही मचाई थी।
शोध रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने प्रमुख नदियों, ग्लेशियरों के मुहानों, नालों और ऊंचाई वाले पहाड़ों पर जमा मलबे की पहचान कर उसके निस्तारण की सलाह दी है। इसके साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों की निरंतर निगरानी और प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता बताई गई है।
भविष्य के लिए वैज्ञानिकों ने सेडिमेंट सोर्स मैपिंग को अनिवार्य करने और आपदा प्रबंधन नीतियों में क्वांटिटेटिव हैज़र्ड साइंस को शामिल करने की सिफारिश की है। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में हर वर्ष औसतन लगभग 2,000 आपदाएं होती हैं, जबकि 2025 में राज्य ने 2,100 से अधिक घटनाएं झेलीं, जिनमें 263 लोगों की जान चली गई थी। यह अध्ययन राज्य में आपदा जोखिम कम करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर देता है।
