देहरादून। प्रदेश में कम बर्फबारी के कारण भालू शीत निद्रा (हाइबरनेशन) में नहीं जा पा रहे हैं, जिससे उनकी आक्रामक गतिविधियां बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पर्याप्त ठंड और लगातार बर्फबारी न होने से भालू भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर मूवमेंट कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। जनवरी से अब तक राज्य में भालू के हमलों की नौ घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जबकि पिछले वर्ष इन हमलों में अचानक वृद्धि दर्ज की गई थी।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सत्य कुमार के अनुसार, भालू को शीत निद्रा में जाने के लिए कम से कम 2500 मीटर की ऊंचाई पर तीन महीने तक एक फीट गहरी बर्फ का जमाव आवश्यक होता है। हालांकि, इस वर्ष ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि अक्तूबर के बाद से बारिश और बर्फबारी में कमी देखी गई है, जिससे भालुओं का प्राकृतिक व्यवहार प्रभावित हुआ है।

वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक पंकज चौहान ने बताया कि ग्लेशियर की सेहत के लिए दिसंबर से जनवरी के बीच पांच से छह बार बर्फबारी आवश्यक होती है, लेकिन पिछले एक दशक से यह पैटर्न लगातार बिगड़ रहा है। उन्होंने कहा कि प्री-समर में होने वाली बर्फबारी तेजी से पिघल जाती है, जिससे भालुओं को शीत निद्रा के लिए आवश्यक परिस्थितियां नहीं मिल पातीं।

वन विभाग के अनुसार, भालू की सक्रियता बढ़ने से संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा उपाय बढ़ाए गए हैं। पिछले साल भालू के हमलों की 116 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें आठ लोगों की मौत हुई थी और 108 लोग घायल हुए थे। विशेषज्ञों ने लोगों से सतर्क रहने और वन्यजीवों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने की अपील की है।