नैनीताल। उत्तराखंड की जेलों में वर्षों से सजा काट रहे उन कैदियों के लिए हाईकोर्ट ने बड़ी राहत की पहल की है, जिनकी अपील अब तक दाखिल नहीं हो पाई है और जिनके कोई पैरोकार नहीं हैं। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए ऐसे सभी कैदियों का विस्तृत ब्यौरा तलब किया है, ताकि उन्हें कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जा सके और उनके न्याय के अधिकार की रक्षा हो सके।
मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान एक मामले में पाया कि एक कैदी पिछले 22 वर्षों से जेल में सजा काट रहा है, लेकिन उसकी अपील कभी भी हाईकोर्ट में दाखिल नहीं की गई। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए अदालत ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिए कि वह प्रदेश की जेलों में ऐसे सभी मामलों की पहचान कर रिपोर्ट प्रस्तुत करे, जिनकी अपीलें अब तक दायर नहीं हुई हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जेल में बंद कैदियों को आवश्यक कानूनी सेवाएं प्रदान करना राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जेल महानिरीक्षक और संबंधित जेल अधीक्षकों की जिम्मेदारी है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी कैदी केवल संसाधनों या जानकारी के अभाव में न्याय से वंचित न रह जाए।
एक अन्य मामले में 1,299 दिनों की देरी से अपील दायर होने पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि इतनी देरी क्यों होती है। जांच में सामने आया कि पहले के प्रारूप में यह दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं था कि कैदी की अपील दायर हुई है या नहीं, और यदि नहीं हुई तो उसका कारण क्या है।
अब इस कमी को दूर करते हुए राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने संशोधित प्रारूप जारी किया है। इसके तहत जेल अधिकारी प्रत्येक कैदी की स्थिति स्पष्ट रूप से बताएंगे। इसके आधार पर जरूरतमंद कैदियों को वकील उपलब्ध कराए जाएंगे और उनकी अपील दायर कराने में सहायता की जाएगी।
