देहरादून। प्रदेश के सरकारी हाईस्कूलों और इंटरमीडिएट कॉलेजों में शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट से जूझ रही है। आंकड़ों के अनुसार, प्रधानाध्यापक और प्रधानाचार्य के करीब 93 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, जिससे विद्यालयों के संचालन और शैक्षिक गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने बताया कि इन खाली पदों में से 50 प्रतिशत को सीमित विभागीय भर्ती के माध्यम से भरने की योजना बनाई गई थी। इसके लिए राज्य लोक सेवा आयोग को प्रस्ताव भी भेजा गया था, लेकिन राजकीय शिक्षक संघ के विरोध के चलते सरकार को यह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा। शिक्षकों का तर्क है कि प्रधानाध्यापक और प्रधानाचार्य के सभी पद पदोन्नति के माध्यम से ही भरे जाने चाहिए।

मंत्री ने स्पष्ट किया कि एक सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह प्रस्ताव वापस लिया गया है। अब अंतिम निर्णय आने के बाद ही भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।

वहीं, प्रदेश के 133 अशासकीय विद्यालयों में कार्यरत 413 तदर्थ प्रवक्ता और एलटी शिक्षक मौलिक नियुक्ति के लिए अर्ह नहीं पाए गए हैं। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा अधिनियम 2006 की धारा 40 के तहत सेवाओं के विनियमितीकरण के लिए 30 जून 2010 की कट-ऑफ तिथि निर्धारित है। संबंधित शिक्षक इस तिथि के बाद नियुक्त हुए हैं, जिसके कारण वे नियमितीकरण के दायरे में नहीं आते।

इस स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ा दी है और जल्द समाधान की आवश्यकता महसूस की जा रही है।