नई दिल्ली । दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैमिली लॉ मामले में कहा है कि अंतरिम भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) के स्तर पर यह मान लेना कि पत्नी खुद कमाने की क्षमता रखती है, सही नहीं है, जब तक पति द्वारा उसके कमाई का ठोस सबूत नहीं प्रस्तुत किया गया है। कोर्ट ने पति के “खाली दावे” को खारिज करते हुए अंतरिम भत्ता बढ़ाने का भी आदेश दिया।
इस मामले में महिला ने परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती दी था, जिसमें उसे प्रति माह ₹2,500 भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था। पति का दावा था कि उसकी पत्नी नर्सरी टीचर के रूप में कार्यरत है और कमाती भी है, लेकिन उसने कोर्ट में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं पेश किया। हाईकोर्ट ने बताया कि पत्नी ने केवल 11वीं तक पढ़ाई की है और इस तरह के दावे को बिना प्रमाण के सहारा नहीं दिया जा सकता।
महिला ने यह भी कहा कि शादी के बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और 2022 में घर से निकाल दिया गया। उसने पति की आय का भी ब्यौरा दिया, जिसमें प्राइवेट स्कूल में शिक्षक के रूप में सैलरी, ट्यूशन, किराने की दुकान और किराए की आय शामिल थी, लेकिन यह भी दस्तावेज के साथ साबित नहीं हो पाया। वहीं, पति ने खुद को एनजीओ में विशेष शिक्षक बताते हुए कम आय का दावा किया और बैंक स्टेटमेंट भी अधूरा दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि बिना प्रमाणित दावे पर पत्नी की कमाई क्षमता को मानना न्यूनतम मजदूरी के स्तर पर भी उचित नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने पति की आय का आकलन न्यूनतम मजदूरी दर के आधार पर किया और ₹3,500 मासिक के अंतरिम भरण-पोषण का आदेश दिया, साथ ही बकाया राशि तीन महीने में चुकाने का निर्देश भी दिया।
इस फैसले से इस बात पर जोर दिया गया है कि भरण-पोषण के दावे में साक्ष्यों की आवश्यकता होती है और बिना साक्ष्य के दावों को मानकर निर्णय नहीं लिया जा सकता।
