रुड़की। जब भी जंगलों में आग धधकती है या सूखे की स्थिति बनती है, तब कृत्रिम बारिश यानी क्लाउड सीडिंग की चर्चा तेज हो जाती है। लेकिन अब तक यह तकनीक अत्यधिक महंगी होने के कारण सिर्फ प्रस्तावों तक सीमित रही। इस चुनौती का समाधान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की ने निकाल लिया है। संस्थान के निदेशक प्रो. केके पंत के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने एआई आधारित ड्रोन से क्लाउड सीडिंग का सफल परीक्षण कर सस्ता और आधुनिक विकल्प विकसित किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पारंपरिक विमान आधारित क्लाउड सीडिंग पर जहां 20 से 25 करोड़ रुपये तक खर्च आता है, वहीं ड्रोन तकनीक से यही प्रक्रिया करीब ढाई करोड़ रुपये में संभव होगी। इतना ही नहीं, यह तकनीक अधिक सुरक्षित, सटीक और संचालन में आसान भी है। विमान के लिए रनवे और उच्च जोखिम की जरूरत होती है, जबकि ड्रोन को किसी भी स्थान से संचालित किया जा सकता है।
आईआईटी रुड़की ने एक्सेलेसग इंडिया के साथ मिलकर इस एआई आधारित सिस्टम को विकसित किया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत सटीकता है, क्योंकि पारंपरिक तरीके में हवा के कारण रसायनों का छिड़काव लक्ष्य से भटक जाता है।
विशेषज्ञ इसे उत्तराखंड के लिए ‘गेम चेंजर’ मान रहे हैं। जंगलों की आग बुझाने में अभी हेलीकॉप्टर से पानी का छिड़काव किया जाता है, जो महंगा और सीमित प्रभाव वाला है। ड्रोन आधारित प्रणाली से आग लगने से पहले ही वातावरण में नमी बढ़ाकर रोकथाम संभव होगी।
आईआईटी रुड़की के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य के अनुसार, लैब स्तर पर परीक्षण सफल हो चुका है और अब इसे लागू करने के लिए सरकार से सहयोग की आवश्यकता है। यह तकनीक कम बारिश, सूखा और स्नोफॉल प्रबंधन में भी कारगर साबित हो सकती है।
